1.12.10

बेज़ार



पत्थर सा बेज़ार हो गया हूं
किस्मत से बेकार हो गया हूं
यूं ही नहीं कहता मैं कुछ
क्योंकि कितना मैं बर्बाद हो चुका हूं
बाज़ार में नहीं क़ीमत अब मेरी
मैं तो मुफ्त की मार हो गया हूं।।।

18.10.10

भूख...

भूख...



कोई रोता है कोई बिलखता है,
ऐसा सिर्फ हिन्दोस्तान में ही क्यों होता है,
शिक्षा और भोजन बेहतर इंसान का आधार है,
लेकिन ये बातें हमारे यहां निराधार हैं,
यमराज के चमचे कइयों को लीलने को तैयार हैं,
भूख से यहां फैला हर ओर हाहाकार है,
सरकार के घर सब मोटापे के शिकार हैं,
भूख से सिर्फ ग़रीब ही क्य़ों बेकार है,
अनाज के सड़ने का सबको बेसब्री से इंतज़ार है,
नालों के बड़े रास्ते कबके तैयार हैं,
अनाज का इतना होना भी एक चमत्कार है,
खुले में उसे डालकर किया सबने बलात्कार है,
कोर्ट की दखलअंदाज़ी इनको बेकार लगती है,
शरद पवार को ये उनकी हार लगती है,
ना दुआओं का अहसास... ना बद्धुआओं का डर,
सरकारी गैंडों को नहीं होता कोई असर,
भूख का किया ये कैसा व्यापार है,
गरीब को छोड़ा भूखा---
और अमीर को बेकारी का अधिकार है,
लड़ाई है कैसी यहां ना खंजर ना तलवार है,
इनके पास सिर्फ रोना, बिलखना, चीख और पुकार है,
मरने वालों की संख्या यूं हीं नहीं बढ़ती हर बार है,
इससे तो सरकार के सपने होते साकार हैं,
कब मिटेगी ये भूख--- कब होगा अहसास हमें,
कैसी है भूख ? कैसा इसका व्यापार है ?


20.9.10

भारत बंद

भारत बंद



अंधा कानून अपाहिज सरकार...फैला है हर ओर भ्रष्टाचार
बंद की राजनीति, चक्का जाम...जनता का ऐसे में जीना है हराम
हर चीज़ का है यहां एक उपाय...बंद करें और निजात पाएं
जिसने नहीं दिया बंद का साथ...पड़ती है उन पर पत्थरों की बरसात
फिर नहीं आती कहीं कोई आवाज़...घरोंदा तोड़ देती है वो एक मुलाक़ात
जीत-जात, हार-वार... इनके सिर पर है खून सवार
मार-काट, दंगा फसाद... बंद से होता है शंखनाद
जिसका मन होता है वो बंद करता है
जो नहीं करता है वो मरता है
जच्चा का बच्चा सड़क पर हो जाता है
डॉक्टर को छोड़कर सबका सिर शर्म से झुक जाता है
डॉक्टर सफेदपोश होने पर भी कितना खून बहाता है
कोई मरे कोई जिए उसके बाप का क्या जाता है
कुछ दाग़ अच्छे होते हैं, ये कहने में क्या जाता है
लेता है जो जान उसे हैवान कहते हैं
फिर डॉक्टर को हम क्यों भगवान कहते हैं
ऑटो का मीटर पीटी ऊषा से तेज़ दौड़ता है
भ्रष्टाचार की रोटी वो घर में ही तोड़ता है
ऑटो वालों की मक्कारी का निराला अंदाज़ है
वो तो साले पुराने बहानेबाज़ हैं
बंद में ना जाने कितनों का कुछ खोता है
तभी तो वो बंद के बाद रोता है
कहीं पर डंडे, कहीं पर झंडे...
हर ओर नज़ारा जाम सा लगता है
न्यूज़ चैनलों के लिए तो ...
ये क़िस्सा आम सा लगता है
देश बंद करवाने से किसको क्या मिलता है
इससे तो भारत दो क़दम पीछे की ओर गिरता है
बंद के नाम का हर कोई खाता है
ना जाने क्यों ये बंद ही आता है

11.9.10

इमोश्नल अत्याचार।

इमोश्नल अत्याचार।





हम भारतीयों में कुछ Extra करने की आदत हमेशा से रही है, जैसे हम देशसेवा के अलावा भ्रष्टाचार की सेवा भी करते हैं, मैच देखते हुए वो भी Specially Cricket का मैच देखते हुए तरह-तरह की सलाहें देते हैं, सार्वजनिक शौचालयों में विसर्जन के साथ-साथ पान या बलगम जैसी Extra पवित्र वस्तु थूकते हैं। Interview देने जाते हैं तो वहां के सोफों पर ही हाथ साफ कर आते हैं, किसी से बाइक लेते हैं तो Petrol ख़त्म करके ही घर आते हैं, Metro में रोज़ सफर करते हैं पर रोज़ उसकी बेकार सेवाओं की दुहाई देते हैं, चाय की दुकान पर बैठते हैं तो इसकी और उसकी करने से भी ग़ुरेज़ नहीं करते हैं, ऐसा करने में कमी कुछ नहीं होती बल्कि अति ही होती है। मैं भी भारतीय हूं, और इन सब आदतों का मुझमें होना भी स्वाभाविक है।



मैं हर रोज़ नहाने के अलावा गाना भी गाता हूं। मैं दिल्लीवासी हूं, इसीलिए मेरे नल में दिल्ली वाली यमुना का पानी आता है। आप भी तो महाराष्ट्र, सौराष्ट्र और आदि राष्ट्रों के होंगे और आप के नल में भी आपके राष्ट्र वाला पानी ही आता होगा। तो दोस्तों मेरे नल में जो दिल्ली वाली यमुना का पानी आता है, वो इतना खुशबूदार होता है कि उसके पान और स्नान के लिए सुअर निरंतर तरस्ते रहते हैं। मैं नहाकर दफ्तर जाता हूं, तो बॉस मेरी ग़रीबी का मजा़क उड़ाते हुए कहता है क्यूं लेखक महाशय-“आज भी नल के पानी का परफ्यूम लगा कर आएं हैं”। घर में क्या मिनरल वॉटर ख़त्म हो गया था? मेरी प्यारी दिल्ली के इस नल से पानी पीते ही आपको ईश्वर के सारे रुप और वो ख़ुद बेहद क़रीब लगने लगता है, और यमराज मानों दरवाजे पर बार-बार दस्तक देता है। ऐसे ही पवित्र जल में नहाने के वक्त मैं गा रहा था “कान्हा तेरी यमुना मैली हो गई दिल्ली के पाप धोते –धोते”।



उस मटकी चोर कान्हा तक तो मेरी पुकार नहीं पहुंची, हां मेरे पड़ोसी ने मेरी मधुर आवाज़ में मेरा गाना ज़रुर सुन लिया और आते ही बोले भई क्या बात है-“प्यारे”। आप को तो बाथरुम सिंगर में होना चाहिए था। खै़र वो हमारे पड़ोसी हैं-“भगवान ऐसा पड़ोसी सबको दे”, क्यूंकि निंदक को पास रखने की आवश्यकता ख़त्म हो जाती है। शुक्ला जी में विरोधी दल की आत्मा का निवास है, इसलिए मेरे विरोध का कोई भी मौक़ा छोड़ते नहीं हैं। इस बार भी नहीं चूंके और मेरी मां के सामने मेरे फिल्मी ज्ञान की खिल्ली उड़ाते बोले–“देखा दीदी इसे कोई भी काम सही नहीं आता है”। इसे तो ये आसान सा गाना भी नहीं आता है। “प्यारे” गाना इस तरह से है, “राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते-धोते”।



यमुना ने भला आज तक किसी के पाप धोए हैं क्या? 2 हज़ार करोड़ जिसकी सफाई में लगे हों और फिर भी वो साफ ना हुई हो भला वो यमुना किसके पाप धो सकती है। इतने में शायद मिनरल वॉटर की यमुना ज़रूर बह जाती अगर सरकार सच्ची होती तो। सच ही कहा है शुक्ला जी ने कि यमुना ने पाप धोए नहीं बल्कि इकट्ठा किए हैं, खास कर दिल्ली वाली यमुना ने और सच कहा मेरी मां ने अरे भाई साहब इसने आज-तक कोई काम सही किया है जो आज करेगा? किया होता तो आज कुछ बन गया होता, यूं फ्रीलांसर ना कहलाता। इसके बाकि सभी दोस्त-लोग बीस से पच्चीस हजार रुपये हर महीना कमाते है और ये प्यारे 9 हजार से सात हजार पर आ जाते हैं, और रोज़ दफ्तर जाते हैं। बाकि सब का Promotion होता है और इनका राम ही जाने ?

मैंने अपनी मां की बात को अनसुना करते हुए कहा पर शुक्ला जी हमारी दिल्ली की नदी तो यमुना है। हम तो दिल्ली की ही बात करेंगे। वैसे भी अंकल वो गंगा हो या यमुना, रावी हो या व्यास, सभी के किनारों पर इन नदियों को मैला करने की महामुहिम छेड़ी हुई है। पुराने गीतकार जब इन नदियों और पानी पर गीत लिखते थे तो हालात कुछ और थे। शायद तभी आज पानी और नदी से जुड़े गीत ना लिखे जाते ना ही सुनाई देते हैं। वैसे भी आज ये गीत तो किसी भी नदी के साथ गाया जा सकता है। शुक्ला जी ने फिर मेरी खुश्की उड़ाते हुए कहा- “गालो हेमन्त जितना गाना है”। ये गीत तुम ज़्यादा दिन तक नहीं गा पाओगे, क्यूंकि बिन पानी सब सूना होने वाला है। भविष्यवाणी तो कबकि हो चुकी है, कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही लड़ा जाएगा और आप तो हिन्दी वाले है जानते ही होंगे कि, रहीम ने बहुत पहले ही बता दिया था- “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून”। हमनें तो पानी रखा नहीं तो अब सब सूना ही होने जा रहा है। मैंने देखा कि मेरे चिर विरोधी पड़ोसी होने के बावजूद शुक्ला जी सहमति जता रहे हैं। वो मेरी ही तरह व्याकुल और चिंतित हैं।

मैंने कहा-“शुक्ला जी ये क्या पाकिस्तान की तरह आप भी अपना पड़ोसी धर्म भूल रहे हैं”। आपको तो मुझे मेरे निरंतर विरोध से मुझे आतंकित करना है। शुक्ला जी ने कहा- प्यारे जब संकट मानवता पर हो तो हमें छोटे विरोध भूल ही जाने चाहिए। तुम तो देख ही रहे हो कि पीने का ही नही मनुष्य के अंदर का भी पानी सूख रहा है। मानवीय रिश्ते सूखकर कांटा हो गए हैं। हमारे जीवन से गांव, मौहल्ला तो गायब ही हो चुके थे, अब परिवार भी छिन गया है। अलग-अलग स्वाद वाला पानी गायब हो गया है, रह गया है तो एक ही स्वाद वाला मिनरल वॉटर। बदलते होंगे कुछ कोस में भाषा और कुछ कोस में पानी पर आजकल कुछ नहीं बदलता मैं पशुवत् की तरह जीने वाले इंसानों की बात नहीं कर रहा हूं। जो आज भी जोहड़, तालाब और कुओं का पानी पीता है, और अपनी भाषा बोलता है। मैं तो उस सभ्य इंसान की बात कर रहा हूं। जो मिनलर वॉटर पीता है और Five Star भाषा बोलता है। ऐसे सभ्य लोग गितने कोस क्यूं ना चललें, इनकी भाषा और पानी नहीं बदलता है। सभ्य मनुष्य दूसरों को सभ्य बनाता है, ताकि उसकी सभ्यता टिकी रहे और उसे संभालने वाले गु़लाम मिल जांए।



आप तो जानते ही हैं कि आजकल अमेरिकी विश्व को सभ्य बनाने में लगे हुए हैं, उसने हमारे देश को बता दिया है कि हमारा खान-पान असभ्य है और इस वजह से ही विश्व में अन्न संकट पैदा हुआ है। वो हमें बता रहा है कि हमारी खानेपीने की आदतें ठीक नहीं हैं और हमें खाने की तमीज़ नहीं है। आज हमारी राजनीति, हमारे शेयर बाज़ार, हमारी युवाशक्ति तो वहां से संचालित हो ही रही है वो दिन भी दूर नहीं जब हमारा खानापीना भी वहीं से संचालित होने लगेगा। ये कहकर शुक्ला जी ऐसे उदास हो गए जैसे उनके घर में चार लड़कियों ने एक साथ जन्म ले लिया हो।




पानी सदा से डराता रहा है, कभी अपने अतिरेक से और कभी अपने सूखेपन से। इस साल 6 अगस्त को लेह में जो हुआ, हर साल सूखा जो आता है, बिहार की बाढ़, और मुम्बई का कहर, इन सबसे सभी वाक़िफ हैं। ज़मीन का पानी सूख रखा है और समुद्र का पानी किनारे पर बसे शहरों को उजाड़ने के लिए अपना विकास कर रहा है। मुझे पूरा भरोसा है कि जब तक इंसान के अंदर का पानी नहीं सूखेगा। तब तक शुक्ला जी के चिर विरोधी स्वभाव के बावजूद इंसान हर ख़तरे के खिलाफ एकजुट रहेगा। तब तक पानी चाहे कितना डरा ले पर हरा नहीं सकेगा। लेकिन इन सब चीज़ों के बावजूद हमें पानी के लिए सजक रहना चाहिए और हर संभव तौर तरीकों से पानी को बचाना चाहिए। कल्पना कीजिए पानी के साथ जीवन और पानी के बिना जीवन।

25.8.10

कशमकश



कशमकश

घर में बच्चे की किलकारी से घर गुलशन होता है। लेकिन जब वो पैदा होता है तो सिर्फ बच्चा ही होता है, या यूं कहें कि साक्षात् भगवान का रूप होता है , लेकिन धीरे-धीरे नवजात शिशु बच्चा बन जाता है...फिर बड़ा होकर जवान कहलाता है और एक उम्र गुज़रने के बाद बूढ़ा हो जाता है, लेकिन जीवन में हर कोई अपना रंग,अपना ढंग और अपना नसीब लेकर आता है ...उसी के आधार पर कोई राजा बनता है और कोई रंक....लेकिन इस बनने और बिगड़ने की आपाधापी में हम शायद कुछ भूल जाते हैं कि आखिर हम हैं क्या.. ?......और थे क्या.... ?....

कुदरत की इस बेशक़ीमती धरा पर जन्म तो आम इंसान बन कर लेते हैं, लेकिन वक्त के अजीबो-गरीब फेर में कुछ और ही बन जाते हैं। जैसे....गांव में कोई अपने रौब, रसूख और रूबाब से दबंग बन जाता है तो कलाकार अपनी कला के ज़रिए कलाकार कहलाता है। तो वहीं डॉक्टर उपचार और सेवा के ज़रिए धरती पर भगवान का अक्स बन जाता है, तो समाज का भला करने वाले और जनता के प्रतिनिधि लोगों के माई-बाप बन जाते हैं। लेकिन सवाल एक है कि आखिर हम हैं क्या.... ?....

आज हम भौतिकवादी कुछ ज्यादा ही हो गए हैं। तभी तो जीवन की आम रफ्तार से भी आगे दौड़ना चाहते हैं। गांव शहर बनना चाहता है और वहां के लोग शहर जैसे एलीट तबका बनना चाहता है। इस महत्वकांशी जहां में हर कोई कुछ ना कुछ बनना ही चाहता है। कुछ तो बन जाते हैं अपनी क़ाबिलीयत से ....और कुछों को तो समाज ही बना देता है।क्योंकि हम सब सामाजिक प्राणी हैं और ऐसे में समाज का भी तो दायित्व होता है। हमारे व्यक्तिव के निमार्ण में।
कई जगह पढ़ा है-----पहले आप देश को दें फिर देश भी आप को देगा।
आज मानव चांद पर भी पहंच गया और मंगल पर भी पहंच गया। उसने Brahmaand में भी क़दम रखा और तो और ख़ुदा के पाक़ घर में भी लेकिन शायद धरती पर आते ही उसे उसकी औक़ात याद आ जाती है और वो भूल जाता है कि आखिर वो है क्या ?....

समाज समय-समय पर अलग-अलग अंदाज़ों में बंट जाता है, कभी अमीरी ग़रीबी के हिसाब से …तो कभी धर्म के हिसाब से। लेकिन इन सब से मरने ,कटने और बचने के बाद ...सवाल सिर्फ एक ही है कि आखिर क्या हैं हम.... ?....

अगर बुद्धि मिल जाए तो बुद्धिजीवी ....बल मिल जाए तो बलशाली , कुछ नहीं मिले तो बदनसीब, और दिमाग़ ना मिले तो पागल ।
आज देश को आज़ाद हुए 63 साल हो गए हैं। अगर कोई पूछे भी कि आज़ादी के क्या मायने होते हैं तो शायद यही आज़ादी होनी चाहिए कि आप ख़ुद जिएं और औरों को जीनें दें.....बस अपने 15 रू0 के फायदे के चक्कर में दूसरों का 1500 को नुकसान ना करें..।...

किसी ज़माने में तहज़ीब ,तमीज़ और संस्कारों की वजह से भारत ने दुनिया की नुमाइंदगी की थी और आज अमरीका वो काम कर रहा है... लेकिन अलग अंदाज़ और नापाक़ इरादे से ....क्या उसकी सोच ही सबकी सोच है....?
क्या पूरे विश्व के लोग यही चाहते हैं या कुछ और ?
लेकिन सवाल एक है कि क्या धरती पर पैदा होने वाले लोगों में से कोई इंसान बनना चाहता है.....?
क्योंकि अगर मनुष्य सबसे पहले इंसान बनना चाहेगा तभी वो खुद ढ़ंग से जीयेगा और औरों को जीने देगा।
क़ुदरत की नायाब, पाक़,अदभुत् धरती पर इंसान बनें।
शैतान या भगवान नहीं.......
ख़ुद जिएं औरों को जीनें दें.....

4.8.10

बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव



बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव

बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव
अब नहीं रही कहीं कोई छांव
कट गए पेड़ और रह गए मैदान
दूर-दूर तक नहीं...
अब इंसानियत का निशान
बेलगाम हो चुका है सब
ये ना पूछो कि ...कब
इंसान इतना बदल गया
कि आइना भी उसे देखकर
अब तस्वीर बदल देता है
इतना बदलने पर भी
दिखता कुछ वैसा ही है
अपने कारनामों से वो
कुछ अलग हो गया है
भूख कुछ ज़्यादा लगती है
लेकिन भर पेट खाने से भी नहीं डटती है
पेट बड़ा हुआ है या...
कि भूख ...
ये किससे पूछूं...
मन की व्य़था शांत नहीं होती
प्रगति के नाम पर
रंगरेज़ से मेरे देस में क्या-क्या हो गया
भौतिक वादी हम इतने हो गए
शहर तो शहर ...
गांव के लोग भी ख़ुद से बेगाने हो गए...
गाय-भैंसों की जगह गाड़ियों ने ले ली
बीजनों की जगह ए.सी आ गए
लोक गीत भी हिप-हौप बन गए
हरियाली तो बस घर में रह गई
चूल्हों की जगह गैस हो गई
लेकिन हमारी भूख कितनी बाकि रह गई
शहर में भी जगह नहीं बची
और अब गांव भी गायब हो गए
सिकुड़ गया सब कुछ
तो भूख कैसे बच गई
घटने की बजाए
ये तो रोज़ बढ़ गई
बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव
अब नहीं रही कहीं कोई छांव।।।