
मौत का ये सच
कोई नहीं पाता इससे बच
विधि का ये फरमान
कितनी अजीब है...
ये उसकी दास्तान ।।।
बचपन से जवानी तक का खेल
पर एक ना एक दिन,
हर कोई होता है फेल,
क्यों इतना बेरहम बन जाता है...
विधि का विधान,
ये तो हैं उसके रोज़मर्रा के काम ।।
आने पर खुशी---जाने पर दुख:
क्यों दे जाता है वो एक शख्स ?
करीब क्यों बनता है वो...
कि अब हर किसी में दिखता है
उसी का अक्स।।
शायद ये भारी दौर नहीं होगा कल,
पर ज़िन्दगी तो ढहर सी गई है इसी पल,
तन्हाई की परछाई है आज साथ,
क्यों लम्बी हो गई है,
और दिनों से ज़्यादा लम्बी,
आज की ये काली रात।
ना कोई संग है ना कोई साथ,
कहां पर ढ़ूंढ़ू उस शख्स को ?
जिसने छोड़ा मेरा साथ,
मौत का ये गोरखधंधा,
क्यों करता है यमराज ?
किसी की ज़िन्दगी लेता है कल,
तो किसी की आज ।।।


