भारत बंद
अंधा कानून अपाहिज सरकार...फैला है हर ओर भ्रष्टाचार
बंद की राजनीति, चक्का जाम...जनता का ऐसे में जीना है हराम
हर चीज़ का है यहां एक उपाय...बंद करें और निजात पाएं
जिसने नहीं दिया बंद का साथ...पड़ती है उन पर पत्थरों की बरसात
फिर नहीं आती कहीं कोई आवाज़...घरोंदा तोड़ देती है वो एक मुलाक़ात
जीत-जात, हार-वार... इनके सिर पर है खून सवार
मार-काट, दंगा फसाद... बंद से होता है शंखनाद
जिसका मन होता है वो बंद करता है
जो नहीं करता है वो मरता है
जच्चा का बच्चा सड़क पर हो जाता है
डॉक्टर को छोड़कर सबका सिर शर्म से झुक जाता है
डॉक्टर सफेदपोश होने पर भी कितना खून बहाता है
कोई मरे कोई जिए उसके बाप का क्या जाता है
कुछ दाग़ अच्छे होते हैं, ये कहने में क्या जाता है
लेता है जो जान उसे हैवान कहते हैं
फिर डॉक्टर को हम क्यों भगवान कहते हैं
ऑटो का मीटर पीटी ऊषा से तेज़ दौड़ता है
भ्रष्टाचार की रोटी वो घर में ही तोड़ता है
ऑटो वालों की मक्कारी का निराला अंदाज़ है
वो तो साले पुराने बहानेबाज़ हैं
बंद में ना जाने कितनों का कुछ खोता है
तभी तो वो बंद के बाद रोता है
कहीं पर डंडे, कहीं पर झंडे...
हर ओर नज़ारा जाम सा लगता है
न्यूज़ चैनलों के लिए तो ...
ये क़िस्सा आम सा लगता है
देश बंद करवाने से किसको क्या मिलता है
इससे तो भारत दो क़दम पीछे की ओर गिरता है
बंद के नाम का हर कोई खाता है
ना जाने क्यों ये बंद ही आता है
इमोश्नल अत्याचार।
हम भारतीयों में कुछ Extra करने की आदत हमेशा से रही है, जैसे हम देशसेवा के अलावा भ्रष्टाचार की सेवा भी करते हैं, मैच देखते हुए वो भी Specially Cricket का मैच देखते हुए तरह-तरह की सलाहें देते हैं, सार्वजनिक शौचालयों में विसर्जन के साथ-साथ पान या बलगम जैसी Extra पवित्र वस्तु थूकते हैं। Interview देने जाते हैं तो वहां के सोफों पर ही हाथ साफ कर आते हैं, किसी से बाइक लेते हैं तो Petrol ख़त्म करके ही घर आते हैं, Metro में रोज़ सफर करते हैं पर रोज़ उसकी बेकार सेवाओं की दुहाई देते हैं, चाय की दुकान पर बैठते हैं तो इसकी और उसकी करने से भी ग़ुरेज़ नहीं करते हैं, ऐसा करने में कमी कुछ नहीं होती बल्कि अति ही होती है। मैं भी भारतीय हूं, और इन सब आदतों का मुझमें होना भी स्वाभाविक है।
मैं हर रोज़ नहाने के अलावा गाना भी गाता हूं। मैं दिल्लीवासी हूं, इसीलिए मेरे नल में दिल्ली वाली यमुना का पानी आता है। आप भी तो महाराष्ट्र, सौराष्ट्र और आदि राष्ट्रों के होंगे और आप के नल में भी आपके राष्ट्र वाला पानी ही आता होगा। तो दोस्तों मेरे नल में जो दिल्ली वाली यमुना का पानी आता है, वो इतना खुशबूदार होता है कि उसके पान और स्नान के लिए सुअर निरंतर तरस्ते रहते हैं। मैं नहाकर दफ्तर जाता हूं, तो बॉस मेरी ग़रीबी का मजा़क उड़ाते हुए कहता है क्यूं लेखक महाशय-“आज भी नल के पानी का परफ्यूम लगा कर आएं हैं”। घर में क्या मिनरल वॉटर ख़त्म हो गया था? मेरी प्यारी दिल्ली के इस नल से पानी पीते ही आपको ईश्वर के सारे रुप और वो ख़ुद बेहद क़रीब लगने लगता है, और यमराज मानों दरवाजे पर बार-बार दस्तक देता है। ऐसे ही पवित्र जल में नहाने के वक्त मैं गा रहा था “कान्हा तेरी यमुना मैली हो गई दिल्ली के पाप धोते –धोते”।
उस मटकी चोर कान्हा तक तो मेरी पुकार नहीं पहुंची, हां मेरे पड़ोसी ने मेरी मधुर आवाज़ में मेरा गाना ज़रुर सुन लिया और आते ही बोले भई क्या बात है-“प्यारे”। आप को तो बाथरुम सिंगर में होना चाहिए था। खै़र वो हमारे पड़ोसी हैं-“भगवान ऐसा पड़ोसी सबको दे”, क्यूंकि निंदक को पास रखने की आवश्यकता ख़त्म हो जाती है। शुक्ला जी में विरोधी दल की आत्मा का निवास है, इसलिए मेरे विरोध का कोई भी मौक़ा छोड़ते नहीं हैं। इस बार भी नहीं चूंके और मेरी मां के सामने मेरे फिल्मी ज्ञान की खिल्ली उड़ाते बोले–“देखा दीदी इसे कोई भी काम सही नहीं आता है”। इसे तो ये आसान सा गाना भी नहीं आता है। “प्यारे” गाना इस तरह से है, “राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते-धोते”।
यमुना ने भला आज तक किसी के पाप धोए हैं क्या? 2 हज़ार करोड़ जिसकी सफाई में लगे हों और फिर भी वो साफ ना हुई हो भला वो यमुना किसके पाप धो सकती है। इतने में शायद मिनरल वॉटर की यमुना ज़रूर बह जाती अगर सरकार सच्ची होती तो। सच ही कहा है शुक्ला जी ने कि यमुना ने पाप धोए नहीं बल्कि इकट्ठा किए हैं, खास कर दिल्ली वाली यमुना ने और सच कहा मेरी मां ने अरे भाई साहब इसने आज-तक कोई काम सही किया है जो आज करेगा? किया होता तो आज कुछ बन गया होता, यूं फ्रीलांसर ना कहलाता। इसके बाकि सभी दोस्त-लोग बीस से पच्चीस हजार रुपये हर महीना कमाते है और ये प्यारे 9 हजार से सात हजार पर आ जाते हैं, और रोज़ दफ्तर जाते हैं। बाकि सब का Promotion होता है और इनका राम ही जाने ?
मैंने अपनी मां की बात को अनसुना करते हुए कहा पर शुक्ला जी हमारी दिल्ली की नदी तो यमुना है। हम तो दिल्ली की ही बात करेंगे। वैसे भी अंकल वो गंगा हो या यमुना, रावी हो या व्यास, सभी के किनारों पर इन नदियों को मैला करने की महामुहिम छेड़ी हुई है। पुराने गीतकार जब इन नदियों और पानी पर गीत लिखते थे तो हालात कुछ और थे। शायद तभी आज पानी और नदी से जुड़े गीत ना लिखे जाते ना ही सुनाई देते हैं। वैसे भी आज ये गीत तो किसी भी नदी के साथ गाया जा सकता है। शुक्ला जी ने फिर मेरी खुश्की उड़ाते हुए कहा- “गालो हेमन्त जितना गाना है”। ये गीत तुम ज़्यादा दिन तक नहीं गा पाओगे, क्यूंकि बिन पानी सब सूना होने वाला है। भविष्यवाणी तो कबकि हो चुकी है, कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही लड़ा जाएगा और आप तो हिन्दी वाले है जानते ही होंगे कि, रहीम ने बहुत पहले ही बता दिया था- “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून”। हमनें तो पानी रखा नहीं तो अब सब सूना ही होने जा रहा है। मैंने देखा कि मेरे चिर विरोधी पड़ोसी होने के बावजूद शुक्ला जी सहमति जता रहे हैं। वो मेरी ही तरह व्याकुल और चिंतित हैं।
मैंने कहा-“शुक्ला जी ये क्या पाकिस्तान की तरह आप भी अपना पड़ोसी धर्म भूल रहे हैं”। आपको तो मुझे मेरे निरंतर विरोध से मुझे आतंकित करना है। शुक्ला जी ने कहा- प्यारे जब संकट मानवता पर हो तो हमें छोटे विरोध भूल ही जाने चाहिए। तुम तो देख ही रहे हो कि पीने का ही नही मनुष्य के अंदर का भी पानी सूख रहा है। मानवीय रिश्ते सूखकर कांटा हो गए हैं। हमारे जीवन से गांव, मौहल्ला तो गायब ही हो चुके थे, अब परिवार भी छिन गया है। अलग-अलग स्वाद वाला पानी गायब हो गया है, रह गया है तो एक ही स्वाद वाला मिनरल वॉटर। बदलते होंगे कुछ कोस में भाषा और कुछ कोस में पानी पर आजकल कुछ नहीं बदलता मैं पशुवत् की तरह जीने वाले इंसानों की बात नहीं कर रहा हूं। जो आज भी जोहड़, तालाब और कुओं का पानी पीता है, और अपनी भाषा बोलता है। मैं तो उस सभ्य इंसान की बात कर रहा हूं। जो मिनलर वॉटर पीता है और Five Star भाषा बोलता है। ऐसे सभ्य लोग गितने कोस क्यूं ना चललें, इनकी भाषा और पानी नहीं बदलता है। सभ्य मनुष्य दूसरों को सभ्य बनाता है, ताकि उसकी सभ्यता टिकी रहे और उसे संभालने वाले गु़लाम मिल जांए।

आप तो जानते ही हैं कि आजकल अमेरिकी विश्व को सभ्य बनाने में लगे हुए हैं, उसने हमारे देश को बता दिया है कि हमारा खान-पान असभ्य है और इस वजह से ही विश्व में अन्न संकट पैदा हुआ है। वो हमें बता रहा है कि हमारी खानेपीने की आदतें ठीक नहीं हैं और हमें खाने की तमीज़ नहीं है। आज हमारी राजनीति, हमारे शेयर बाज़ार, हमारी युवाशक्ति तो वहां से संचालित हो ही रही है वो दिन भी दूर नहीं जब हमारा खानापीना भी वहीं से संचालित होने लगेगा। ये कहकर शुक्ला जी ऐसे उदास हो गए जैसे उनके घर में चार लड़कियों ने एक साथ जन्म ले लिया हो।
पानी सदा से डराता रहा है, कभी अपने अतिरेक से और कभी अपने सूखेपन से। इस साल 6 अगस्त को लेह में जो हुआ, हर साल सूखा जो आता है, बिहार की बाढ़, और मुम्बई का कहर, इन सबसे सभी वाक़िफ हैं। ज़मीन का पानी सूख रखा है और समुद्र का पानी किनारे पर बसे शहरों को उजाड़ने के लिए अपना विकास कर रहा है। मुझे पूरा भरोसा है कि जब तक इंसान के अंदर का पानी नहीं सूखेगा। तब तक शुक्ला जी के चिर विरोधी स्वभाव के बावजूद इंसान हर ख़तरे के खिलाफ एकजुट रहेगा। तब तक पानी चाहे कितना डरा ले पर हरा नहीं सकेगा। लेकिन इन सब चीज़ों के बावजूद हमें पानी के लिए सजक रहना चाहिए और हर संभव तौर तरीकों से पानी को बचाना चाहिए। कल्पना कीजिए पानी के साथ जीवन और पानी के बिना जीवन।