
अंधा कानून अपाहिज सरकार...फैला है हर ओर भ्रष्टाचार
बंद की राजनीति, चक्का जाम...जनता का ऐसे में जीना है हराम
हर चीज़ का है यहां एक उपाय...बंद करें और निजात पाएं
जिसने नहीं दिया बंद का साथ...पड़ती है उन पर पत्थरों की बरसात
फिर नहीं आती कहीं कोई आवाज़...घरोंदा तोड़ देती है वो एक मुलाक़ात
जीत-जात, हार-वार... इनके सिर पर है खून सवार
मार-काट, दंगा फसाद... बंद से होता है शंखनाद
जिसका मन होता है वो बंद करता है
जो नहीं करता है वो मरता है
जच्चा का बच्चा सड़क पर हो जाता है
डॉक्टर को छोड़कर सबका सिर शर्म से झुक जाता है
डॉक्टर सफेदपोश होने पर भी कितना खून बहाता है
कोई मरे कोई जिए उसके बाप का क्या जाता है
कुछ दाग़ अच्छे होते हैं, ये कहने में क्या जाता है
लेता है जो जान उसे हैवान कहते हैं
फिर डॉक्टर को हम क्यों भगवान कहते हैं
ऑटो का मीटर पीटी ऊषा से तेज़ दौड़ता है
भ्रष्टाचार की रोटी वो घर में ही तोड़ता है
ऑटो वालों की मक्कारी का निराला अंदाज़ है
वो तो साले पुराने बहानेबाज़ हैं
बंद में ना जाने कितनों का कुछ खोता है
तभी तो वो बंद के बाद रोता है
कहीं पर डंडे, कहीं पर झंडे...
हर ओर नज़ारा जाम सा लगता है
न्यूज़ चैनलों के लिए तो ...
ये क़िस्सा आम सा लगता है
देश बंद करवाने से किसको क्या मिलता है
इससे तो भारत दो क़दम पीछे की ओर गिरता है
बंद के नाम का हर कोई खाता है
ना जाने क्यों ये बंद ही आता है
5 comments:
nice poem. a satire
हकीकत ब्याँ करती बढिया रचना.....
आभार्!
Indeed wonderful poem
keep writing .. :)
..........Bilkul Fact likha hai
jo hota hai Bharat mein,
its very nice.
keep writing..:)
हेमंत, तुमने सवाल उठाया है कि आख़िर मुट्ठी भर लोग कैसे बंद थोपने में कामयाब हो जाते हैं। ये एक टीम वर्क की तरह है जो भीड़ पर थोप दिया जाता है। भीड़ आखिर भीड़ है उसमें अंतःक्रिया नहीं होती। आज़ादी से पहले की जानी वाली और समाजवाद के झंडाबरदारों लोहिया और जेपी की हड़ताल और आज आम हो चुके बंद में यही फर्क है। हड़ताल एक विचार है जिससे जनता जुड़कर सहयोग देती है और बंद जबरदस्ती है जिसे थोप दिया जाता है। इससे बचने के लिए भीड़ बने रहने के बजाय एकजुट होने की जरूरत
है।
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