1.12.10

बेज़ार



पत्थर सा बेज़ार हो गया हूं
किस्मत से बेकार हो गया हूं
यूं ही नहीं कहता मैं कुछ
क्योंकि कितना मैं बर्बाद हो चुका हूं
बाज़ार में नहीं क़ीमत अब मेरी
मैं तो मुफ्त की मार हो गया हूं।।।

18.10.10

भूख...

भूख...



कोई रोता है कोई बिलखता है,
ऐसा सिर्फ हिन्दोस्तान में ही क्यों होता है,
शिक्षा और भोजन बेहतर इंसान का आधार है,
लेकिन ये बातें हमारे यहां निराधार हैं,
यमराज के चमचे कइयों को लीलने को तैयार हैं,
भूख से यहां फैला हर ओर हाहाकार है,
सरकार के घर सब मोटापे के शिकार हैं,
भूख से सिर्फ ग़रीब ही क्य़ों बेकार है,
अनाज के सड़ने का सबको बेसब्री से इंतज़ार है,
नालों के बड़े रास्ते कबके तैयार हैं,
अनाज का इतना होना भी एक चमत्कार है,
खुले में उसे डालकर किया सबने बलात्कार है,
कोर्ट की दखलअंदाज़ी इनको बेकार लगती है,
शरद पवार को ये उनकी हार लगती है,
ना दुआओं का अहसास... ना बद्धुआओं का डर,
सरकारी गैंडों को नहीं होता कोई असर,
भूख का किया ये कैसा व्यापार है,
गरीब को छोड़ा भूखा---
और अमीर को बेकारी का अधिकार है,
लड़ाई है कैसी यहां ना खंजर ना तलवार है,
इनके पास सिर्फ रोना, बिलखना, चीख और पुकार है,
मरने वालों की संख्या यूं हीं नहीं बढ़ती हर बार है,
इससे तो सरकार के सपने होते साकार हैं,
कब मिटेगी ये भूख--- कब होगा अहसास हमें,
कैसी है भूख ? कैसा इसका व्यापार है ?


20.9.10

भारत बंद

भारत बंद



अंधा कानून अपाहिज सरकार...फैला है हर ओर भ्रष्टाचार
बंद की राजनीति, चक्का जाम...जनता का ऐसे में जीना है हराम
हर चीज़ का है यहां एक उपाय...बंद करें और निजात पाएं
जिसने नहीं दिया बंद का साथ...पड़ती है उन पर पत्थरों की बरसात
फिर नहीं आती कहीं कोई आवाज़...घरोंदा तोड़ देती है वो एक मुलाक़ात
जीत-जात, हार-वार... इनके सिर पर है खून सवार
मार-काट, दंगा फसाद... बंद से होता है शंखनाद
जिसका मन होता है वो बंद करता है
जो नहीं करता है वो मरता है
जच्चा का बच्चा सड़क पर हो जाता है
डॉक्टर को छोड़कर सबका सिर शर्म से झुक जाता है
डॉक्टर सफेदपोश होने पर भी कितना खून बहाता है
कोई मरे कोई जिए उसके बाप का क्या जाता है
कुछ दाग़ अच्छे होते हैं, ये कहने में क्या जाता है
लेता है जो जान उसे हैवान कहते हैं
फिर डॉक्टर को हम क्यों भगवान कहते हैं
ऑटो का मीटर पीटी ऊषा से तेज़ दौड़ता है
भ्रष्टाचार की रोटी वो घर में ही तोड़ता है
ऑटो वालों की मक्कारी का निराला अंदाज़ है
वो तो साले पुराने बहानेबाज़ हैं
बंद में ना जाने कितनों का कुछ खोता है
तभी तो वो बंद के बाद रोता है
कहीं पर डंडे, कहीं पर झंडे...
हर ओर नज़ारा जाम सा लगता है
न्यूज़ चैनलों के लिए तो ...
ये क़िस्सा आम सा लगता है
देश बंद करवाने से किसको क्या मिलता है
इससे तो भारत दो क़दम पीछे की ओर गिरता है
बंद के नाम का हर कोई खाता है
ना जाने क्यों ये बंद ही आता है

11.9.10

इमोश्नल अत्याचार।

इमोश्नल अत्याचार।





हम भारतीयों में कुछ Extra करने की आदत हमेशा से रही है, जैसे हम देशसेवा के अलावा भ्रष्टाचार की सेवा भी करते हैं, मैच देखते हुए वो भी Specially Cricket का मैच देखते हुए तरह-तरह की सलाहें देते हैं, सार्वजनिक शौचालयों में विसर्जन के साथ-साथ पान या बलगम जैसी Extra पवित्र वस्तु थूकते हैं। Interview देने जाते हैं तो वहां के सोफों पर ही हाथ साफ कर आते हैं, किसी से बाइक लेते हैं तो Petrol ख़त्म करके ही घर आते हैं, Metro में रोज़ सफर करते हैं पर रोज़ उसकी बेकार सेवाओं की दुहाई देते हैं, चाय की दुकान पर बैठते हैं तो इसकी और उसकी करने से भी ग़ुरेज़ नहीं करते हैं, ऐसा करने में कमी कुछ नहीं होती बल्कि अति ही होती है। मैं भी भारतीय हूं, और इन सब आदतों का मुझमें होना भी स्वाभाविक है।



मैं हर रोज़ नहाने के अलावा गाना भी गाता हूं। मैं दिल्लीवासी हूं, इसीलिए मेरे नल में दिल्ली वाली यमुना का पानी आता है। आप भी तो महाराष्ट्र, सौराष्ट्र और आदि राष्ट्रों के होंगे और आप के नल में भी आपके राष्ट्र वाला पानी ही आता होगा। तो दोस्तों मेरे नल में जो दिल्ली वाली यमुना का पानी आता है, वो इतना खुशबूदार होता है कि उसके पान और स्नान के लिए सुअर निरंतर तरस्ते रहते हैं। मैं नहाकर दफ्तर जाता हूं, तो बॉस मेरी ग़रीबी का मजा़क उड़ाते हुए कहता है क्यूं लेखक महाशय-“आज भी नल के पानी का परफ्यूम लगा कर आएं हैं”। घर में क्या मिनरल वॉटर ख़त्म हो गया था? मेरी प्यारी दिल्ली के इस नल से पानी पीते ही आपको ईश्वर के सारे रुप और वो ख़ुद बेहद क़रीब लगने लगता है, और यमराज मानों दरवाजे पर बार-बार दस्तक देता है। ऐसे ही पवित्र जल में नहाने के वक्त मैं गा रहा था “कान्हा तेरी यमुना मैली हो गई दिल्ली के पाप धोते –धोते”।



उस मटकी चोर कान्हा तक तो मेरी पुकार नहीं पहुंची, हां मेरे पड़ोसी ने मेरी मधुर आवाज़ में मेरा गाना ज़रुर सुन लिया और आते ही बोले भई क्या बात है-“प्यारे”। आप को तो बाथरुम सिंगर में होना चाहिए था। खै़र वो हमारे पड़ोसी हैं-“भगवान ऐसा पड़ोसी सबको दे”, क्यूंकि निंदक को पास रखने की आवश्यकता ख़त्म हो जाती है। शुक्ला जी में विरोधी दल की आत्मा का निवास है, इसलिए मेरे विरोध का कोई भी मौक़ा छोड़ते नहीं हैं। इस बार भी नहीं चूंके और मेरी मां के सामने मेरे फिल्मी ज्ञान की खिल्ली उड़ाते बोले–“देखा दीदी इसे कोई भी काम सही नहीं आता है”। इसे तो ये आसान सा गाना भी नहीं आता है। “प्यारे” गाना इस तरह से है, “राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते-धोते”।



यमुना ने भला आज तक किसी के पाप धोए हैं क्या? 2 हज़ार करोड़ जिसकी सफाई में लगे हों और फिर भी वो साफ ना हुई हो भला वो यमुना किसके पाप धो सकती है। इतने में शायद मिनरल वॉटर की यमुना ज़रूर बह जाती अगर सरकार सच्ची होती तो। सच ही कहा है शुक्ला जी ने कि यमुना ने पाप धोए नहीं बल्कि इकट्ठा किए हैं, खास कर दिल्ली वाली यमुना ने और सच कहा मेरी मां ने अरे भाई साहब इसने आज-तक कोई काम सही किया है जो आज करेगा? किया होता तो आज कुछ बन गया होता, यूं फ्रीलांसर ना कहलाता। इसके बाकि सभी दोस्त-लोग बीस से पच्चीस हजार रुपये हर महीना कमाते है और ये प्यारे 9 हजार से सात हजार पर आ जाते हैं, और रोज़ दफ्तर जाते हैं। बाकि सब का Promotion होता है और इनका राम ही जाने ?

मैंने अपनी मां की बात को अनसुना करते हुए कहा पर शुक्ला जी हमारी दिल्ली की नदी तो यमुना है। हम तो दिल्ली की ही बात करेंगे। वैसे भी अंकल वो गंगा हो या यमुना, रावी हो या व्यास, सभी के किनारों पर इन नदियों को मैला करने की महामुहिम छेड़ी हुई है। पुराने गीतकार जब इन नदियों और पानी पर गीत लिखते थे तो हालात कुछ और थे। शायद तभी आज पानी और नदी से जुड़े गीत ना लिखे जाते ना ही सुनाई देते हैं। वैसे भी आज ये गीत तो किसी भी नदी के साथ गाया जा सकता है। शुक्ला जी ने फिर मेरी खुश्की उड़ाते हुए कहा- “गालो हेमन्त जितना गाना है”। ये गीत तुम ज़्यादा दिन तक नहीं गा पाओगे, क्यूंकि बिन पानी सब सूना होने वाला है। भविष्यवाणी तो कबकि हो चुकी है, कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही लड़ा जाएगा और आप तो हिन्दी वाले है जानते ही होंगे कि, रहीम ने बहुत पहले ही बता दिया था- “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून”। हमनें तो पानी रखा नहीं तो अब सब सूना ही होने जा रहा है। मैंने देखा कि मेरे चिर विरोधी पड़ोसी होने के बावजूद शुक्ला जी सहमति जता रहे हैं। वो मेरी ही तरह व्याकुल और चिंतित हैं।

मैंने कहा-“शुक्ला जी ये क्या पाकिस्तान की तरह आप भी अपना पड़ोसी धर्म भूल रहे हैं”। आपको तो मुझे मेरे निरंतर विरोध से मुझे आतंकित करना है। शुक्ला जी ने कहा- प्यारे जब संकट मानवता पर हो तो हमें छोटे विरोध भूल ही जाने चाहिए। तुम तो देख ही रहे हो कि पीने का ही नही मनुष्य के अंदर का भी पानी सूख रहा है। मानवीय रिश्ते सूखकर कांटा हो गए हैं। हमारे जीवन से गांव, मौहल्ला तो गायब ही हो चुके थे, अब परिवार भी छिन गया है। अलग-अलग स्वाद वाला पानी गायब हो गया है, रह गया है तो एक ही स्वाद वाला मिनरल वॉटर। बदलते होंगे कुछ कोस में भाषा और कुछ कोस में पानी पर आजकल कुछ नहीं बदलता मैं पशुवत् की तरह जीने वाले इंसानों की बात नहीं कर रहा हूं। जो आज भी जोहड़, तालाब और कुओं का पानी पीता है, और अपनी भाषा बोलता है। मैं तो उस सभ्य इंसान की बात कर रहा हूं। जो मिनलर वॉटर पीता है और Five Star भाषा बोलता है। ऐसे सभ्य लोग गितने कोस क्यूं ना चललें, इनकी भाषा और पानी नहीं बदलता है। सभ्य मनुष्य दूसरों को सभ्य बनाता है, ताकि उसकी सभ्यता टिकी रहे और उसे संभालने वाले गु़लाम मिल जांए।



आप तो जानते ही हैं कि आजकल अमेरिकी विश्व को सभ्य बनाने में लगे हुए हैं, उसने हमारे देश को बता दिया है कि हमारा खान-पान असभ्य है और इस वजह से ही विश्व में अन्न संकट पैदा हुआ है। वो हमें बता रहा है कि हमारी खानेपीने की आदतें ठीक नहीं हैं और हमें खाने की तमीज़ नहीं है। आज हमारी राजनीति, हमारे शेयर बाज़ार, हमारी युवाशक्ति तो वहां से संचालित हो ही रही है वो दिन भी दूर नहीं जब हमारा खानापीना भी वहीं से संचालित होने लगेगा। ये कहकर शुक्ला जी ऐसे उदास हो गए जैसे उनके घर में चार लड़कियों ने एक साथ जन्म ले लिया हो।




पानी सदा से डराता रहा है, कभी अपने अतिरेक से और कभी अपने सूखेपन से। इस साल 6 अगस्त को लेह में जो हुआ, हर साल सूखा जो आता है, बिहार की बाढ़, और मुम्बई का कहर, इन सबसे सभी वाक़िफ हैं। ज़मीन का पानी सूख रखा है और समुद्र का पानी किनारे पर बसे शहरों को उजाड़ने के लिए अपना विकास कर रहा है। मुझे पूरा भरोसा है कि जब तक इंसान के अंदर का पानी नहीं सूखेगा। तब तक शुक्ला जी के चिर विरोधी स्वभाव के बावजूद इंसान हर ख़तरे के खिलाफ एकजुट रहेगा। तब तक पानी चाहे कितना डरा ले पर हरा नहीं सकेगा। लेकिन इन सब चीज़ों के बावजूद हमें पानी के लिए सजक रहना चाहिए और हर संभव तौर तरीकों से पानी को बचाना चाहिए। कल्पना कीजिए पानी के साथ जीवन और पानी के बिना जीवन।

25.8.10

कशमकश



कशमकश

घर में बच्चे की किलकारी से घर गुलशन होता है। लेकिन जब वो पैदा होता है तो सिर्फ बच्चा ही होता है, या यूं कहें कि साक्षात् भगवान का रूप होता है , लेकिन धीरे-धीरे नवजात शिशु बच्चा बन जाता है...फिर बड़ा होकर जवान कहलाता है और एक उम्र गुज़रने के बाद बूढ़ा हो जाता है, लेकिन जीवन में हर कोई अपना रंग,अपना ढंग और अपना नसीब लेकर आता है ...उसी के आधार पर कोई राजा बनता है और कोई रंक....लेकिन इस बनने और बिगड़ने की आपाधापी में हम शायद कुछ भूल जाते हैं कि आखिर हम हैं क्या.. ?......और थे क्या.... ?....

कुदरत की इस बेशक़ीमती धरा पर जन्म तो आम इंसान बन कर लेते हैं, लेकिन वक्त के अजीबो-गरीब फेर में कुछ और ही बन जाते हैं। जैसे....गांव में कोई अपने रौब, रसूख और रूबाब से दबंग बन जाता है तो कलाकार अपनी कला के ज़रिए कलाकार कहलाता है। तो वहीं डॉक्टर उपचार और सेवा के ज़रिए धरती पर भगवान का अक्स बन जाता है, तो समाज का भला करने वाले और जनता के प्रतिनिधि लोगों के माई-बाप बन जाते हैं। लेकिन सवाल एक है कि आखिर हम हैं क्या.... ?....

आज हम भौतिकवादी कुछ ज्यादा ही हो गए हैं। तभी तो जीवन की आम रफ्तार से भी आगे दौड़ना चाहते हैं। गांव शहर बनना चाहता है और वहां के लोग शहर जैसे एलीट तबका बनना चाहता है। इस महत्वकांशी जहां में हर कोई कुछ ना कुछ बनना ही चाहता है। कुछ तो बन जाते हैं अपनी क़ाबिलीयत से ....और कुछों को तो समाज ही बना देता है।क्योंकि हम सब सामाजिक प्राणी हैं और ऐसे में समाज का भी तो दायित्व होता है। हमारे व्यक्तिव के निमार्ण में।
कई जगह पढ़ा है-----पहले आप देश को दें फिर देश भी आप को देगा।
आज मानव चांद पर भी पहंच गया और मंगल पर भी पहंच गया। उसने Brahmaand में भी क़दम रखा और तो और ख़ुदा के पाक़ घर में भी लेकिन शायद धरती पर आते ही उसे उसकी औक़ात याद आ जाती है और वो भूल जाता है कि आखिर वो है क्या ?....

समाज समय-समय पर अलग-अलग अंदाज़ों में बंट जाता है, कभी अमीरी ग़रीबी के हिसाब से …तो कभी धर्म के हिसाब से। लेकिन इन सब से मरने ,कटने और बचने के बाद ...सवाल सिर्फ एक ही है कि आखिर क्या हैं हम.... ?....

अगर बुद्धि मिल जाए तो बुद्धिजीवी ....बल मिल जाए तो बलशाली , कुछ नहीं मिले तो बदनसीब, और दिमाग़ ना मिले तो पागल ।
आज देश को आज़ाद हुए 63 साल हो गए हैं। अगर कोई पूछे भी कि आज़ादी के क्या मायने होते हैं तो शायद यही आज़ादी होनी चाहिए कि आप ख़ुद जिएं और औरों को जीनें दें.....बस अपने 15 रू0 के फायदे के चक्कर में दूसरों का 1500 को नुकसान ना करें..।...

किसी ज़माने में तहज़ीब ,तमीज़ और संस्कारों की वजह से भारत ने दुनिया की नुमाइंदगी की थी और आज अमरीका वो काम कर रहा है... लेकिन अलग अंदाज़ और नापाक़ इरादे से ....क्या उसकी सोच ही सबकी सोच है....?
क्या पूरे विश्व के लोग यही चाहते हैं या कुछ और ?
लेकिन सवाल एक है कि क्या धरती पर पैदा होने वाले लोगों में से कोई इंसान बनना चाहता है.....?
क्योंकि अगर मनुष्य सबसे पहले इंसान बनना चाहेगा तभी वो खुद ढ़ंग से जीयेगा और औरों को जीने देगा।
क़ुदरत की नायाब, पाक़,अदभुत् धरती पर इंसान बनें।
शैतान या भगवान नहीं.......
ख़ुद जिएं औरों को जीनें दें.....

4.8.10

बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव



बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव

बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव
अब नहीं रही कहीं कोई छांव
कट गए पेड़ और रह गए मैदान
दूर-दूर तक नहीं...
अब इंसानियत का निशान
बेलगाम हो चुका है सब
ये ना पूछो कि ...कब
इंसान इतना बदल गया
कि आइना भी उसे देखकर
अब तस्वीर बदल देता है
इतना बदलने पर भी
दिखता कुछ वैसा ही है
अपने कारनामों से वो
कुछ अलग हो गया है
भूख कुछ ज़्यादा लगती है
लेकिन भर पेट खाने से भी नहीं डटती है
पेट बड़ा हुआ है या...
कि भूख ...
ये किससे पूछूं...
मन की व्य़था शांत नहीं होती
प्रगति के नाम पर
रंगरेज़ से मेरे देस में क्या-क्या हो गया
भौतिक वादी हम इतने हो गए
शहर तो शहर ...
गांव के लोग भी ख़ुद से बेगाने हो गए...
गाय-भैंसों की जगह गाड़ियों ने ले ली
बीजनों की जगह ए.सी आ गए
लोक गीत भी हिप-हौप बन गए
हरियाली तो बस घर में रह गई
चूल्हों की जगह गैस हो गई
लेकिन हमारी भूख कितनी बाकि रह गई
शहर में भी जगह नहीं बची
और अब गांव भी गायब हो गए
सिकुड़ गया सब कुछ
तो भूख कैसे बच गई
घटने की बजाए
ये तो रोज़ बढ़ गई
बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव
अब नहीं रही कहीं कोई छांव।।।

9.6.10

ये दीदी है या कोई दादा।।।



ये दीदी है या कोई दादा
जिसने अकेले किया जनता से वादा
भेस बनाया बिल्कुल सादा
प्रदेश की 36 पालिकाओं को अकेले काटा
अगले साल के विधानसभा के फाइनल को
इस साल सेमीफाइनल जीत कर
साफ कर दिया अपना इरादा...
तृकां की सर्वेसर्वा और रेलवे की महामहिम
बंगाल में इतनी जुझारू
लेकिन प्लेटफॉर्मों पर वो गईं थम
अपनी जीत की है ख़शी बहुत
पर बेगुनाहों के मरने पर नहीं कोई ग़म
नाम है ममता और काम है जनता
मेल है इनमें बहुत ही कम
वाम का मोर्चा भ्रष्टाचार लील गया
कॉग्रेस का सेतारा भी बंगाल में हिल गया
तृकां का सिक्का कुछ ज़्यादा चल गया
मरने कटने पर ममता नहीं जिन्हें
उनका ज़मीर कब का सो गया
अपने नेता बनने पर दीदी को क्यों ग़ुमान हो गया
ये दीदी है या कोई दादा ।।।

13.5.10

नकेल कसनी है मुझे।।।



नकेल कसनी है मुझे
आज के व्हशी समाज की
स्कूलों में बढ़ती फीस के मिजाज़ की
सरकारी दफ्तरों के कामकाज की
पंचायतों के बेमानी अंदाज़ की

नकेल कसनी है मुझे
फालतू के बाज़ारवाद की
गिरते मौलिक अधिकार की
तार-तार होते रिश्तों के धार की
आस्था से खिलवाड़ की
गिरते सुर और साज़ की

नकेल कसनी है मुझे
आतंकवाद की आग की
खेल से खिलवाड़ की
काले कारोबार की
गुंडों के विस्तार की
पैसों की गुहार की
और पनपते भ्रष्टाचार की

नकेल कसनी है मुझे
पुलिस के व्यापार की
गुस्से और तक़रार की
लड़कियों के व्यापार की
बचपन पर पड़ते भार की
और नेताओं के दुलार की।।।

12.5.10

मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं ।।।



मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं
तेरी परछाई की इकाई में
ख़ुद को बुनता हूं ।
तेरी कहानी में
ख़ुद के शब्द ढूंढ़ता हूं ।
तेरे अफसाने से
मैं फसाना बन गया हूं ।
तेरे यूं ही कहने से
मैं दीवाना बन गया हूं ।
मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं ।।

तेरे हल्का गुनगुनाने से
एक गाना बन गया हूं ।
तेरी यादों की फहरिस्त में
पहरों बेसुद सा रहता हूं ।
तेरे छूटने के डर से
ख़ुद से जूझता हूं ।
तेरी तस्वीर के साथ
मैं ख़ुद को भूलता हूं ।
तेरे आने की आहट से
फिर ज़िन्दा हुआ हूं ।
मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं ।।

11.5.10

पुरानी यादें खर्च करना चाहता हूं



पुरानी यादें खर्च करना चाहता हूं
मैं फिर से सबसे मिलना चाहता हूं
याद आता है वो दौर---
वो तस्वीर खिंचवाने की ललक
वो बात-बात पर लड़ने की सनक
वो धुंधली मैडल की चमक
वो चलना पगडंडी पर छोड़ के सड़क
वो Meeting Point का मज़ा
वो Bike से गिरने की सज़ा
वो पापा का समझाना
और मेरा हर बात पर सिर झुकाना
वो करना घंटों तक बक-बक
और चलना इतना कि जाना थक
पुरानी यादें खर्च करना चाहता हूं
मैं कुछ कहना चाहता हूं।।।

रहना हमेशा जोश से लबरेज़
करना कारनामे हैरतअंगेज़
वो देखना टीवी पर फैशन बार-बार
वो समझना खुद को बड़ा सुपरस्टार
वो सुनना गाना इतना तेज़
कि हिल जाए मेरे पड़ोसी की मेज़
वो Plan बनाना लड़की को प्रपोज़ का
लेकिन फिर कहना ये क़िस्सा है रोज़ का
वो बताना नौकरी का Burden
और कहना मैं तो हूं परेशान हरदम
वो करना सुबह शाम पार्टी
वो मानना खुद को Smarty
पुरानी यादें खर्च करना चाहता हूं
मैं कुछ कहना चाहता हूं।।।

10.5.10

पंख



अपने हिस्से की खुशी तो सबको प्यारी है
जीवन में नेक काम करने की अब किसकी बारी है
अपने हिस्से की धूप और अपने हिस्से की छांव हो
तमन्नाएं हो पूरी बस यही भाव हो
बेघर को घर बूढ़े को सहारा पाना है
लेकिन अभी बच्चों को तो नया सपना दिलाना है
नीयत नेक है और है हौंसला भी
ज़मीर अभी ज़िन्दा है वो नहीं गिरा अभी
कटी धारा को जोड़ा जिसने
सपनों को इतने पंख दिए
काम किए बस काम किए हैं
बस यूं ही आज़ाद हुए
आज़ाद न्यूज़ सबकी आवाज़ ।।

13.4.10

पानी की कहानी ।।।



पानी की कहानी ।।।

ये बेरंग सा दिखने वाला पारदर्शी तत्व
पीने का पानी कहलाता है।
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
पानी रे पानी तेरा ढंग कैसा।
ये पानी भी कितना अजीब है
कभी कहीं निशुल्क मिलता है
तो कहीं पर पैसों का।।
लेकिन बचपन से सुना है-
अनमोल चीज़ों का कोई मोल नहीं।
फिर यहां तो तोल भी है
और इस अनमोल चीज़ का मोल भी।
कहीं रेहड़ी पर 50 पैसे गिलास पीने का पानी
जिसे Drinking Water भी कहते हैं
और हां इस पानी से प्यास भी बुझती है।
तो कहीं Drinking Water की एक लीटर
बोतल की कीमत करीबन 10रू से 15 रू तक।
और ये पानी भी प्यास बुझाता है।
लेकिन एक और पानी है जो थोड़ा सा अलग है
लेकिन हम उसे पी सकते हैं।
और वो है Mineral Water…
उसकी क़ीमत बाकि सभी पानी से अलग है।
और ये पानी तकरीबन 30 से 40 रू में 1 लीटर मिलता है।

क्या ये पानी भी प्यास बुझाता है ?
अगर हां तो फिर ठीक है,
और अगर नहीं तो फिर--
जिनकी प्यास है बड़ी उनके लिए क्या ?
इस Mineral Water से प्यास बुझे ना बुझे,
पर जेब में आग तो ज़रूर लग जाएगी.....
समाज तो पहले से ही तीन वर्गों में विभाजित था,
सो अब अनमोल पानी भी बंट गया
वो भी तीन वर्गों में।।
तभी तो कहते हैं,,,
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
पानी रे पानी तेरा ढंग कैसा।।

29.3.10

मौत ।।।



मौत का ये सच
कोई नहीं पाता इससे बच
विधि का ये फरमान
कितनी अजीब है...
ये उसकी दास्तान ।।।

बचपन से जवानी तक का खेल
पर एक ना एक दिन,
हर कोई होता है फेल,
क्यों इतना बेरहम बन जाता है...
विधि का विधान,
ये तो हैं उसके रोज़मर्रा के काम ।।

आने पर खुशी---जाने पर दुख:
क्यों दे जाता है वो एक शख्स ?
करीब क्यों बनता है वो...
कि अब हर किसी में दिखता है
उसी का अक्स।।

शायद ये भारी दौर नहीं होगा कल,
पर ज़िन्दगी तो ढहर सी गई है इसी पल,
तन्हाई की परछाई है आज साथ,
क्यों लम्बी हो गई है,
और दिनों से ज़्यादा लम्बी,
आज की ये काली रात।

ना कोई संग है ना कोई साथ,
कहां पर ढ़ूंढ़ू उस शख्स को ?
जिसने छोड़ा मेरा साथ,
मौत का ये गोरखधंधा,
क्यों करता है यमराज ?
किसी की ज़िन्दगी लेता है कल,
तो किसी की आज ।।।

25.3.10

धुंधली राह



ज़िन्दगी का मोड़ है कितना अजीब,
चौराहे पर खड़े हैं
मिलता नहीं नसीब...
राहें हैं कई और नई सारी,
किस पर मिलेगी जीत की क्यारी,
बचपन में ही थी ज़िन्दगी प्यारी,
जहां कुछ नहीं पता था,
बस थी तो सिर्फ ख़ुमारी...
सयाने भए, आई Tention की बारी,
अब तो दिखती है बस कांटों की क्यारी,
दिखता दूर तक...
रेगिस्तानं सा जहां है,
इस धूल की भीड़ में कौन कहां है।
जीत की कौड़ी लगती दूर है,
सपने सारे कांच से चूर-चूर हैं
भविष्य तो लगता है-
रेत में सूंई ढूंढ़ने के बराबर ?

याद



कभी अपना कभी पराया सा अहसास देती हो
एक पल को आती फिर दूर चली जाती
धुंधली सी प्यास देती हो...
मीठी हैं बातें तुम्हारी
हर बात खुश होकर कहती हो
तन सांवल मन सच्चा
दिल से बिल्कुल बच्ची हो
तभी तो एक भुट्टे के लिए
कितनी जुझारू दिखती हो
मिलने का मन, तड़प और बेक़रारी है
हां पूनम ये सारी तुम्हारी ख़ुमारी है

3.3.10

My Name is Khan.



My Name is Khan.

ख़ान सिर्फ नाम नहीं
वो एक पहचान है

ज़िन्दगी को हर पल
जीने का नया नाम है
ईमान का कोई धर्म नहीं
यही बात महान है
नीयत है जिसकी नेक
वही सच्चा इंसान है
अपने रास्ते खुद बनाए
वो एक इंसान है
पहचान की लड़ाई का
ये नया ऐलान है
जीतता सिर्फ वही है
जिसमें बाकि मान है
ख़ान सिर्फ नाम नहीं
वो एक पहचान है।।


हर पल प्यार बांटना
ये उसकी शान है
इंसान सिर्फ दो किस्म के
ये उसका ज्ञान है
मान-सम्मान की राजनीति से
वो कितना महान है
मुंम्बई में जिसका मान नहीं
पर विश्व में उसका सम्मान है
वाह ख़ान कितना बड़ा है तू
कैसा तेरा आत्मसम्मान है
ख़ान सिर्फ नाम नहीं
वो एक पहचान है।।।

26.2.10

सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।।



सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।।

सच में सचिन है या कोई फरिश्ता ,
क्यों हर सच पर भारी पड़ता है...
क्रिकेट से इसका रिश्ता,
कितने पीछे लगे कितने साथ हुए...
कुछ रूठे तो कुछ नाराज़ हुए..
कभी भगवान बोला तो कभी यूं ही कह दिया
कभी प्यार दिया, तो कभी सब कुछ ले लिया
लेकिन ये तो हमेशा से अपनी ज़िन्दगी जिया
भला कोई ये बताए...
ऐसा करके सचिन ने क्या बुरा किया...
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

जब से शुरू किया खेल,
सबको मुरीद बना दिया,
बच्चे, बूढ़े और जवान
सबको देखने का नया नज़रिया सिखा दिया
अब खेल...सिर्फ खेल नहीं रहा ...
इसने इसे रण कर सब कुछ अकेले सहा
कभी ताज बना,कभी रीढ़ बना
कभी जान तक दे डाली
इसने तो सिर्फ क्रिकेट खेला...
नहीं सुनी किसी भी आलोचक की गाली...
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

कई सदियों में जो एक बार जन्म ले
वो सचिन कहलाता है...
खुद से नहीं सिर्फ अपने खेल से ही
ये भगवान भी कहलाता है...
कभी-कभी तो ये रोज़ ही कीर्तिमान बनाता है
लेकिन ऐसा नहीं है...
कि इस पर बुरा दौर नहीं आता है
लेकिन भवंर में से हर बार
बाहर आती है कश्ती जिसकी
ऐसा निडर सिर्फ सचिन ही बन पाता है
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

अपने जज़्बे से सचिन ने रनों का अंबार लगा दिया
ना कोई तोड़ पाए वो ऐसा कारनामा कर दिया
विरोधियों को भी ये सपनों में दिखता है
उनके सपने तोड़ ख़ुद को हक़ीक़त करता है
हर पल जो साथ दे...
वो उसका साथी M.R.F कहलाता है
कभी खुश होकर...तो कभी इतराकर
ये अपने बल्ले को दर्शकों में लहराता है
वाह सचिन ...
तू हर बार सबको अपना कायल कर जाता है
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

कभी शंहशाह, कभी बादशाह बना
कभी blaster, को कभी Dependable कहा
जब ज़ख्मी हुआ तो थोड़ा सा थम गया,
लेकिन उसकी आंधी में सब कुछ रम गया,
हीरा तो सिर्फ हीरा है
चमकना ही उसका काम है
वाह रे सचिन।
तू सच में ही जीता जागता भगवान है
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

17.2.10

ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया ?


ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया ?

ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया,
मिलाया कभी किसी से...
तो कभी ज़ुदा किया,
रूबरू हुए थे जब उनसे,
तो रूख़ से नक़ाब उठ गया था,
ऐसा लगने लगा था-
कि ख़ुद से भी विश्वास उठ गया था,
महसूस कहां होता है कुछ, उस वक्त,
क्यों हवा ठहर जाती है बेवक्त,
रूह जम सी जाती हैं,
सांसें थम सी जाती हैं,
लफ्ज़ तो पड़ जाते हैं मध्धम,
लेकिन धड़कनों में होता है बाकि़ दम,
आंखें होती हैं नम,
ख़ामोशी की भी सरगो़शी है,
यहां तुम्हारे होने की गर्मजोशी है,
क्या क़यामत थी ?
या बला कि ख़ूबसूरत ।
हक़ीकत थीं या कोई मूर्त,
आने से तुम्हारे महकी फिज़ा थी,
बेरंग इस दुनिया में ...
इंद्रधनुष की जगह थी।
सातों रंगों को मिलने की बेक़रारी थी,
पर कोई ये बताए ये कैसी ख़ुमारी थी,
तड़प कर, फड़क कर हर ज़र्रा बोल पड़ा,
जा मिलले उनसे जिसके लिंए एक अर्सा इंतज़ार करना पड़ा,
मिलन के इस पल को क़ैद कर लूं ज़रा,
मेरा मन इतने मिलन से अभी नहीं भरा,
ओ ख़ुदा तूने ऐसा क्यों किया ।।

तेरा कैसा है ये फरमान,
क्या तुझे नहीं पता ?
कि मैं भी हूं एक नेक इंसान,
अभी पल में ही तुम रूख़सत हो जाओगे,
और मुझे अधूरा छोड़ जाओगे,
जाने से तुम्हारे फिज़ा –ख़िज़ा बन जाएगी,
ग़ुलज़ार मेरी ज़िन्दगी बेकार हो जाएगी,
वाह रे ख़ुदाई। तेरा विधान,
मुझे दिलादो इससे निदान,
ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया।।।

16.2.10

काश के मैं एक समाचार होता।।।



काश के मैं एक समाचार होता।।।

काश के मैं एक समाचार होता,
दुनिया भर में मुझपर विचार होता,
क्षण-भर में पहुंच जाता मैं घर-घर,
लोगों को देता ख़बरें तत्पर,
लोग बातें करते मुझ पर,
वो जानते मुझसे और भी बेहतर,
देश ही नहीं विदेश में भी मेरा नाम होता
काश के मैं एक समाचार होता।।


दूरदर्शन को पुराने लोग जानते थे बेहतर,
नई पीढ़ी को कुछ भी नहीं लगा बेहतर,
सोचा रूप बदलूं और बन जाऊं पुराने से बढ़कर,
दिखाया मैंने उनको सनसनी और वारदात जी भर,
लोगों ने कहा, ख़ून खराबे से काश तुझे दूर पाया होता,
ऐसे स्वरूप में तू बदक़िस्मत कभी भी ना आया होता,
मैंने सोचा था –
देश ही नहीं विदेश में भी मेरा नाम होता,
काश के मैं एक समाचार होता,
लोगों का मुझपर विचार होता।।


कभी राजनीति की, कभी रंगमंच की...
और कभी खेल जगत की सैर कर आता हूं,
लेकिन फिर आने के बाद...
ये सारी ख़बरें आप ही को तो सुनाता हूं,
तभी मौसम में गर्मी और सर्दी से बचने के लिए...
सिर्फ आप ही को बताता हूं ।
माना कि, कभी दुख बन कर पहुंचा
और कभी सुख बनकर छाया मैं,
पर थोड़ा सा सहमा और थोड़ा सा घबराया मैं,
कैसे बताऊं मैं तुमको यही है रूप मेरा,
जैसा तुम चाहते थे वैसा ही बनाया है मैंने स्वरूप मेरा,
कभी अच्छा कभी बुरा तुमने ही तो बनाया मुझे,
क्यों अब भी ये लगता है ?
लोग समझ ना पाए मुझे,
परन्तु मेरी हर बात का समाज पर असर होता है,
तभी तो कोई हस्ता है और कोई रोता है,
मैंने सोचा था –
देश ही नहीं विदेश में भी मेरा नाम होता,
काश के मैं एक समाचार होता,
लोगों का मुझपर विचार होता।।

8.2.10

26\11



26\11

आंखें हैं नम, दिल में है ग़म,
है बाक़ी अंदर आग,
जो करेगी आतंकियों को बर्बाद,
मिट जाएगी सरों पर से ये काली छाया,
होगा हर बच्चे पर अब मां का साया,
होंगे सब खुश...
मिट जाएंगे सबके दुख,
सबकी होगी एक जैसी कहानी,
क्योंकि नापाकों को पड़ेगी....
अब मुंह कि खानी,
हिन्द का है, अब एक ही नारा,
हां, जिसे हमने नाम दिया है...

26\11



बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने

है बाक़ी कुछ स्याही और चंद पन्ने,
मन में है मेरे भी कुछ सपने,
ना जाने कितने लिख पाउंगा क़िस्से,
जो कभी बन पाए मेरे जीवन के हिस्से,
इंतज़ार है मुझे किसी का,
पता दे...वो मुझे उसी का,
बेक़रार हूं तो मैं उस सुबह का.. .
जो रात को धकेल कर आए,
और मेरे संग हो जाए,
फिर कुछ याद मुझे भी आए,
तब सारे दिन वो मुझसे बतियाए,
कभी मुस्काए...तो कभी चंहचहाए ।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने

शायद भूला हूं मैं कुछ...
क्योंकि ये तो है बदनाम शहर,
जहां हर वक्त होता है एक पहर,
यहां सुबह... सुबह जैसी नहीं होती,
क्यों अब हर पल लगता है, कि कुदरत रोती,
ना ओस है, ना धुंध
पक्षियों का चंहचहाना भी है गुम़,
जो कभी गाया करते थे,रुमझुम
पर अब तो मिलती है दूधिया लाइट,
जो रहती है, हर दम ब्राइट।
सूरज तो था...कभी आग का गोला,
लेकिन शहरों में तो वो दिखता है भोला,
अब तो सूरज भी चौंक कर बोला...
कि मैंने ऐसा क्या बोला ?
मैंने तो सिर्फ सच्चाई पर से पर्दा खोला ।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने


शहर नहीं है ये...ये है कहर,
जिससे कुदरत भी बेकार हो गई।
ये कैसी शाम है ? जो थोड़ी बदनाम है…
रात तो लगती अफसाना है,
उसे भी ठगने का शायद ये कोई नया बहाना है,
कैसा है ये कुछ स्याही और चंद पन्ने का सफर,
स्याही ने जब तोड़ा दम,
तो पन्ने को भी हुआ ग़म,
ख़त्म हुआ आज का ये किस्सा,
जिसका मैं था हिस्सा।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने ।।।

17.1.10

मां



मां होती है क्या ? किसी को है पता ?
देवों का प्रतिबिम्ब ही मां का स्वरूप है,
देवयुग से मां का रूप ऐसे ही छाया है,
तभी आज हर बच्चे पर मां की ममता का साया है,
मुश्किल में मां का नाम लेकर ही हर बच्चा सफल हो पाया है,
हमको जन्म देकर जीवन के बारे में बताती है,
पहले गोद में लेती है, फिर चलना सिखाती है,
कभी मारती, तो कभी मनाती है,
कभी रूठती, तो फिर खुद ही मान जाती है।
अंधेरे को दूर करके, रौशनी का पता बताती है
हमारा पेट भरने के चक्कर में, खुद भूखी सो जाती है,
जीवन में बेटा नेक बनना , ये मां ही तो सिखाती है।
मां होती है क्या ? किसी को है पता ?

कलियुग के इस दौर में हम मां को भूल जाते हैं,
जिसने हमें चलना सिखाया, उसे ही बीच सड़क छोड़ आते हैं,
भूल तो करते हैं, और उसे भी भूल जाते हैं,
इतने सब कुछ पर भी, मां कुछ नहीं भूल पाती है,
फिर भी मां अपने हर बच्चे पर बस ममता ही बरसाती है,
मां की ममता और विनम्रता उसकी पहचान है,
मां चाहे तेरे जितने भी नाम हैं,
उन सबको मेरा सलाम है, और कोटि-कोटि प्रणाम है।
मां होती है क्या ? किसी को है पता ?