12.5.10

मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं ।।।



मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं
तेरी परछाई की इकाई में
ख़ुद को बुनता हूं ।
तेरी कहानी में
ख़ुद के शब्द ढूंढ़ता हूं ।
तेरे अफसाने से
मैं फसाना बन गया हूं ।
तेरे यूं ही कहने से
मैं दीवाना बन गया हूं ।
मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं ।।

तेरे हल्का गुनगुनाने से
एक गाना बन गया हूं ।
तेरी यादों की फहरिस्त में
पहरों बेसुद सा रहता हूं ।
तेरे छूटने के डर से
ख़ुद से जूझता हूं ।
तेरी तस्वीर के साथ
मैं ख़ुद को भूलता हूं ।
तेरे आने की आहट से
फिर ज़िन्दा हुआ हूं ।
मैं तेरे अक्स में ख़ुद को ढ़ूंढ़ता हूं ।।

3 comments:

बबिता अस्थाना said...

तुम काफी अच्छा लिखते हो, वैसे तुम्हारी कविता मौत मुझे काफी अच्छी लगी...इसी तरह ख़ूबसूरत रचनाओं लिखते रहो.......

Madhukar said...

बहुत उम्दा। क्या बुना है आपने। शब्दों को गूथना आसान नहीं। हर वैचारिक दूरी मिटाने की कोशिश। सह-असतित्व का प्रयास। अच्छा लिखा है। प्रेम गली अति सांकरी ता में दो ना समाय।

Ishika said...

awesome likha hai dear