26.2.10

सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।।



सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।।

सच में सचिन है या कोई फरिश्ता ,
क्यों हर सच पर भारी पड़ता है...
क्रिकेट से इसका रिश्ता,
कितने पीछे लगे कितने साथ हुए...
कुछ रूठे तो कुछ नाराज़ हुए..
कभी भगवान बोला तो कभी यूं ही कह दिया
कभी प्यार दिया, तो कभी सब कुछ ले लिया
लेकिन ये तो हमेशा से अपनी ज़िन्दगी जिया
भला कोई ये बताए...
ऐसा करके सचिन ने क्या बुरा किया...
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

जब से शुरू किया खेल,
सबको मुरीद बना दिया,
बच्चे, बूढ़े और जवान
सबको देखने का नया नज़रिया सिखा दिया
अब खेल...सिर्फ खेल नहीं रहा ...
इसने इसे रण कर सब कुछ अकेले सहा
कभी ताज बना,कभी रीढ़ बना
कभी जान तक दे डाली
इसने तो सिर्फ क्रिकेट खेला...
नहीं सुनी किसी भी आलोचक की गाली...
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

कई सदियों में जो एक बार जन्म ले
वो सचिन कहलाता है...
खुद से नहीं सिर्फ अपने खेल से ही
ये भगवान भी कहलाता है...
कभी-कभी तो ये रोज़ ही कीर्तिमान बनाता है
लेकिन ऐसा नहीं है...
कि इस पर बुरा दौर नहीं आता है
लेकिन भवंर में से हर बार
बाहर आती है कश्ती जिसकी
ऐसा निडर सिर्फ सचिन ही बन पाता है
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

अपने जज़्बे से सचिन ने रनों का अंबार लगा दिया
ना कोई तोड़ पाए वो ऐसा कारनामा कर दिया
विरोधियों को भी ये सपनों में दिखता है
उनके सपने तोड़ ख़ुद को हक़ीक़त करता है
हर पल जो साथ दे...
वो उसका साथी M.R.F कहलाता है
कभी खुश होकर...तो कभी इतराकर
ये अपने बल्ले को दर्शकों में लहराता है
वाह सचिन ...
तू हर बार सबको अपना कायल कर जाता है
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

कभी शंहशाह, कभी बादशाह बना
कभी blaster, को कभी Dependable कहा
जब ज़ख्मी हुआ तो थोड़ा सा थम गया,
लेकिन उसकी आंधी में सब कुछ रम गया,
हीरा तो सिर्फ हीरा है
चमकना ही उसका काम है
वाह रे सचिन।
तू सच में ही जीता जागता भगवान है
सच में सचिन है या कोई फरिश्ता।।

17.2.10

ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया ?


ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया ?

ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया,
मिलाया कभी किसी से...
तो कभी ज़ुदा किया,
रूबरू हुए थे जब उनसे,
तो रूख़ से नक़ाब उठ गया था,
ऐसा लगने लगा था-
कि ख़ुद से भी विश्वास उठ गया था,
महसूस कहां होता है कुछ, उस वक्त,
क्यों हवा ठहर जाती है बेवक्त,
रूह जम सी जाती हैं,
सांसें थम सी जाती हैं,
लफ्ज़ तो पड़ जाते हैं मध्धम,
लेकिन धड़कनों में होता है बाकि़ दम,
आंखें होती हैं नम,
ख़ामोशी की भी सरगो़शी है,
यहां तुम्हारे होने की गर्मजोशी है,
क्या क़यामत थी ?
या बला कि ख़ूबसूरत ।
हक़ीकत थीं या कोई मूर्त,
आने से तुम्हारे महकी फिज़ा थी,
बेरंग इस दुनिया में ...
इंद्रधनुष की जगह थी।
सातों रंगों को मिलने की बेक़रारी थी,
पर कोई ये बताए ये कैसी ख़ुमारी थी,
तड़प कर, फड़क कर हर ज़र्रा बोल पड़ा,
जा मिलले उनसे जिसके लिंए एक अर्सा इंतज़ार करना पड़ा,
मिलन के इस पल को क़ैद कर लूं ज़रा,
मेरा मन इतने मिलन से अभी नहीं भरा,
ओ ख़ुदा तूने ऐसा क्यों किया ।।

तेरा कैसा है ये फरमान,
क्या तुझे नहीं पता ?
कि मैं भी हूं एक नेक इंसान,
अभी पल में ही तुम रूख़सत हो जाओगे,
और मुझे अधूरा छोड़ जाओगे,
जाने से तुम्हारे फिज़ा –ख़िज़ा बन जाएगी,
ग़ुलज़ार मेरी ज़िन्दगी बेकार हो जाएगी,
वाह रे ख़ुदाई। तेरा विधान,
मुझे दिलादो इससे निदान,
ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया।।।

16.2.10

काश के मैं एक समाचार होता।।।



काश के मैं एक समाचार होता।।।

काश के मैं एक समाचार होता,
दुनिया भर में मुझपर विचार होता,
क्षण-भर में पहुंच जाता मैं घर-घर,
लोगों को देता ख़बरें तत्पर,
लोग बातें करते मुझ पर,
वो जानते मुझसे और भी बेहतर,
देश ही नहीं विदेश में भी मेरा नाम होता
काश के मैं एक समाचार होता।।


दूरदर्शन को पुराने लोग जानते थे बेहतर,
नई पीढ़ी को कुछ भी नहीं लगा बेहतर,
सोचा रूप बदलूं और बन जाऊं पुराने से बढ़कर,
दिखाया मैंने उनको सनसनी और वारदात जी भर,
लोगों ने कहा, ख़ून खराबे से काश तुझे दूर पाया होता,
ऐसे स्वरूप में तू बदक़िस्मत कभी भी ना आया होता,
मैंने सोचा था –
देश ही नहीं विदेश में भी मेरा नाम होता,
काश के मैं एक समाचार होता,
लोगों का मुझपर विचार होता।।


कभी राजनीति की, कभी रंगमंच की...
और कभी खेल जगत की सैर कर आता हूं,
लेकिन फिर आने के बाद...
ये सारी ख़बरें आप ही को तो सुनाता हूं,
तभी मौसम में गर्मी और सर्दी से बचने के लिए...
सिर्फ आप ही को बताता हूं ।
माना कि, कभी दुख बन कर पहुंचा
और कभी सुख बनकर छाया मैं,
पर थोड़ा सा सहमा और थोड़ा सा घबराया मैं,
कैसे बताऊं मैं तुमको यही है रूप मेरा,
जैसा तुम चाहते थे वैसा ही बनाया है मैंने स्वरूप मेरा,
कभी अच्छा कभी बुरा तुमने ही तो बनाया मुझे,
क्यों अब भी ये लगता है ?
लोग समझ ना पाए मुझे,
परन्तु मेरी हर बात का समाज पर असर होता है,
तभी तो कोई हस्ता है और कोई रोता है,
मैंने सोचा था –
देश ही नहीं विदेश में भी मेरा नाम होता,
काश के मैं एक समाचार होता,
लोगों का मुझपर विचार होता।।

8.2.10

26\11



26\11

आंखें हैं नम, दिल में है ग़म,
है बाक़ी अंदर आग,
जो करेगी आतंकियों को बर्बाद,
मिट जाएगी सरों पर से ये काली छाया,
होगा हर बच्चे पर अब मां का साया,
होंगे सब खुश...
मिट जाएंगे सबके दुख,
सबकी होगी एक जैसी कहानी,
क्योंकि नापाकों को पड़ेगी....
अब मुंह कि खानी,
हिन्द का है, अब एक ही नारा,
हां, जिसे हमने नाम दिया है...

26\11



बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने

है बाक़ी कुछ स्याही और चंद पन्ने,
मन में है मेरे भी कुछ सपने,
ना जाने कितने लिख पाउंगा क़िस्से,
जो कभी बन पाए मेरे जीवन के हिस्से,
इंतज़ार है मुझे किसी का,
पता दे...वो मुझे उसी का,
बेक़रार हूं तो मैं उस सुबह का.. .
जो रात को धकेल कर आए,
और मेरे संग हो जाए,
फिर कुछ याद मुझे भी आए,
तब सारे दिन वो मुझसे बतियाए,
कभी मुस्काए...तो कभी चंहचहाए ।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने

शायद भूला हूं मैं कुछ...
क्योंकि ये तो है बदनाम शहर,
जहां हर वक्त होता है एक पहर,
यहां सुबह... सुबह जैसी नहीं होती,
क्यों अब हर पल लगता है, कि कुदरत रोती,
ना ओस है, ना धुंध
पक्षियों का चंहचहाना भी है गुम़,
जो कभी गाया करते थे,रुमझुम
पर अब तो मिलती है दूधिया लाइट,
जो रहती है, हर दम ब्राइट।
सूरज तो था...कभी आग का गोला,
लेकिन शहरों में तो वो दिखता है भोला,
अब तो सूरज भी चौंक कर बोला...
कि मैंने ऐसा क्या बोला ?
मैंने तो सिर्फ सच्चाई पर से पर्दा खोला ।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने


शहर नहीं है ये...ये है कहर,
जिससे कुदरत भी बेकार हो गई।
ये कैसी शाम है ? जो थोड़ी बदनाम है…
रात तो लगती अफसाना है,
उसे भी ठगने का शायद ये कोई नया बहाना है,
कैसा है ये कुछ स्याही और चंद पन्ने का सफर,
स्याही ने जब तोड़ा दम,
तो पन्ने को भी हुआ ग़म,
ख़त्म हुआ आज का ये किस्सा,
जिसका मैं था हिस्सा।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने ।।।