
ज़िन्दगी का मोड़ है कितना अजीब,
चौराहे पर खड़े हैं
मिलता नहीं नसीब...
राहें हैं कई और नई सारी,
किस पर मिलेगी जीत की क्यारी,
बचपन में ही थी ज़िन्दगी प्यारी,
जहां कुछ नहीं पता था,
बस थी तो सिर्फ ख़ुमारी...
सयाने भए, आई Tention की बारी,
अब तो दिखती है बस कांटों की क्यारी,
दिखता दूर तक...
रेगिस्तानं सा जहां है,
इस धूल की भीड़ में कौन कहां है।
जीत की कौड़ी लगती दूर है,
सपने सारे कांच से चूर-चूर हैं
भविष्य तो लगता है-
रेत में सूंई ढूंढ़ने के बराबर ?
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