
बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव
बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव
अब नहीं रही कहीं कोई छांव
कट गए पेड़ और रह गए मैदान
दूर-दूर तक नहीं...
अब इंसानियत का निशान
बेलगाम हो चुका है सब
ये ना पूछो कि ...कब
इंसान इतना बदल गया
कि आइना भी उसे देखकर
अब तस्वीर बदल देता है
इतना बदलने पर भी
दिखता कुछ वैसा ही है
अपने कारनामों से वो
कुछ अलग हो गया है
भूख कुछ ज़्यादा लगती है
लेकिन भर पेट खाने से भी नहीं डटती है
पेट बड़ा हुआ है या...
कि भूख ...
ये किससे पूछूं...
मन की व्य़था शांत नहीं होती
प्रगति के नाम पर
रंगरेज़ से मेरे देस में क्या-क्या हो गया
भौतिक वादी हम इतने हो गए
शहर तो शहर ...
गांव के लोग भी ख़ुद से बेगाने हो गए...
गाय-भैंसों की जगह गाड़ियों ने ले ली
बीजनों की जगह ए.सी आ गए
लोक गीत भी हिप-हौप बन गए
हरियाली तो बस घर में रह गई
चूल्हों की जगह गैस हो गई
लेकिन हमारी भूख कितनी बाकि रह गई
शहर में भी जगह नहीं बची
और अब गांव भी गायब हो गए
सिकुड़ गया सब कुछ
तो भूख कैसे बच गई
घटने की बजाए
ये तो रोज़ बढ़ गई
बड़े होते शहर और सिकुड़ते गांव
अब नहीं रही कहीं कोई छांव।।।
4 comments:
wht i say abt it.........
im speechless
So Gud luck & keep writing....
Vivek Gupta
wht i say abt it.........
im speechless
So Gud luch & keep writing....
Vivek Gupta
अच्छा लिखे हो भाई, लेकिन बहुत अच्छा फिर भी नहीं, ये कह सकता हूं, कि तुमने रचनात्मक रुप से काफी सुधार कर लिया है, आशा करता हूं इससे भी बढ़िया लिखोगे।
gud..yar...keep it up...
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