
कशमकश
घर में बच्चे की किलकारी से घर गुलशन होता है। लेकिन जब वो पैदा होता है तो सिर्फ बच्चा ही होता है, या यूं कहें कि साक्षात् भगवान का रूप होता है , लेकिन धीरे-धीरे नवजात शिशु बच्चा बन जाता है...फिर बड़ा होकर जवान कहलाता है और एक उम्र गुज़रने के बाद बूढ़ा हो जाता है, लेकिन जीवन में हर कोई अपना रंग,अपना ढंग और अपना नसीब लेकर आता है ...उसी के आधार पर कोई राजा बनता है और कोई रंक....लेकिन इस बनने और बिगड़ने की आपाधापी में हम शायद कुछ भूल जाते हैं कि आखिर हम हैं क्या.. ?......और थे क्या.... ?....
कुदरत की इस बेशक़ीमती धरा पर जन्म तो आम इंसान बन कर लेते हैं, लेकिन वक्त के अजीबो-गरीब फेर में कुछ और ही बन जाते हैं। जैसे....गांव में कोई अपने रौब, रसूख और रूबाब से दबंग बन जाता है तो कलाकार अपनी कला के ज़रिए कलाकार कहलाता है। तो वहीं डॉक्टर उपचार और सेवा के ज़रिए धरती पर भगवान का अक्स बन जाता है, तो समाज का भला करने वाले और जनता के प्रतिनिधि लोगों के माई-बाप बन जाते हैं। लेकिन सवाल एक है कि आखिर हम हैं क्या.... ?....
आज हम भौतिकवादी कुछ ज्यादा ही हो गए हैं। तभी तो जीवन की आम रफ्तार से भी आगे दौड़ना चाहते हैं। गांव शहर बनना चाहता है और वहां के लोग शहर जैसे एलीट तबका बनना चाहता है। इस महत्वकांशी जहां में हर कोई कुछ ना कुछ बनना ही चाहता है। कुछ तो बन जाते हैं अपनी क़ाबिलीयत से ....और कुछों को तो समाज ही बना देता है।क्योंकि हम सब सामाजिक प्राणी हैं और ऐसे में समाज का भी तो दायित्व होता है। हमारे व्यक्तिव के निमार्ण में।
कई जगह पढ़ा है-----पहले आप देश को दें फिर देश भी आप को देगा।
आज मानव चांद पर भी पहंच गया और मंगल पर भी पहंच गया। उसने Brahmaand में भी क़दम रखा और तो और ख़ुदा के पाक़ घर में भी लेकिन शायद धरती पर आते ही उसे उसकी औक़ात याद आ जाती है और वो भूल जाता है कि आखिर वो है क्या ?....
समाज समय-समय पर अलग-अलग अंदाज़ों में बंट जाता है, कभी अमीरी ग़रीबी के हिसाब से …तो कभी धर्म के हिसाब से। लेकिन इन सब से मरने ,कटने और बचने के बाद ...सवाल सिर्फ एक ही है कि आखिर क्या हैं हम.... ?....
अगर बुद्धि मिल जाए तो बुद्धिजीवी ....बल मिल जाए तो बलशाली , कुछ नहीं मिले तो बदनसीब, और दिमाग़ ना मिले तो पागल ।
आज देश को आज़ाद हुए 63 साल हो गए हैं। अगर कोई पूछे भी कि आज़ादी के क्या मायने होते हैं तो शायद यही आज़ादी होनी चाहिए कि आप ख़ुद जिएं और औरों को जीनें दें.....बस अपने 15 रू0 के फायदे के चक्कर में दूसरों का 1500 को नुकसान ना करें..।...
किसी ज़माने में तहज़ीब ,तमीज़ और संस्कारों की वजह से भारत ने दुनिया की नुमाइंदगी की थी और आज अमरीका वो काम कर रहा है... लेकिन अलग अंदाज़ और नापाक़ इरादे से ....क्या उसकी सोच ही सबकी सोच है....?
क्या पूरे विश्व के लोग यही चाहते हैं या कुछ और ?
लेकिन सवाल एक है कि क्या धरती पर पैदा होने वाले लोगों में से कोई इंसान बनना चाहता है.....?
क्योंकि अगर मनुष्य सबसे पहले इंसान बनना चाहेगा तभी वो खुद ढ़ंग से जीयेगा और औरों को जीने देगा।
क़ुदरत की नायाब, पाक़,अदभुत् धरती पर इंसान बनें।
शैतान या भगवान नहीं.......
ख़ुद जिएं औरों को जीनें दें.....
4 comments:
http://nsuidusu2010.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1283243637319
kya baat hai ye bilkul sach hai ki pehle insaan hi bunna chahiye
sach mein life bhi ek kasmhmakash hai.
Le jaayegi kahan ye raah, kahan wo manzilain apni
Anjaane, andekhe raaston se guzar rahi hai zindagi
Ye kashmakash ka silsila ye ummeedon ke jalte diye
Andheron ko hata kar roshni ki de sehar ae zindagi
क्या बात है....लिखा तो तुमने बहुत अच्छा है..पर बात तो तब बने जब इसपर गंभीरता से अमल किया जाये....
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