17.2.10

ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया ?


ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया ?

ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया,
मिलाया कभी किसी से...
तो कभी ज़ुदा किया,
रूबरू हुए थे जब उनसे,
तो रूख़ से नक़ाब उठ गया था,
ऐसा लगने लगा था-
कि ख़ुद से भी विश्वास उठ गया था,
महसूस कहां होता है कुछ, उस वक्त,
क्यों हवा ठहर जाती है बेवक्त,
रूह जम सी जाती हैं,
सांसें थम सी जाती हैं,
लफ्ज़ तो पड़ जाते हैं मध्धम,
लेकिन धड़कनों में होता है बाकि़ दम,
आंखें होती हैं नम,
ख़ामोशी की भी सरगो़शी है,
यहां तुम्हारे होने की गर्मजोशी है,
क्या क़यामत थी ?
या बला कि ख़ूबसूरत ।
हक़ीकत थीं या कोई मूर्त,
आने से तुम्हारे महकी फिज़ा थी,
बेरंग इस दुनिया में ...
इंद्रधनुष की जगह थी।
सातों रंगों को मिलने की बेक़रारी थी,
पर कोई ये बताए ये कैसी ख़ुमारी थी,
तड़प कर, फड़क कर हर ज़र्रा बोल पड़ा,
जा मिलले उनसे जिसके लिंए एक अर्सा इंतज़ार करना पड़ा,
मिलन के इस पल को क़ैद कर लूं ज़रा,
मेरा मन इतने मिलन से अभी नहीं भरा,
ओ ख़ुदा तूने ऐसा क्यों किया ।।

तेरा कैसा है ये फरमान,
क्या तुझे नहीं पता ?
कि मैं भी हूं एक नेक इंसान,
अभी पल में ही तुम रूख़सत हो जाओगे,
और मुझे अधूरा छोड़ जाओगे,
जाने से तुम्हारे फिज़ा –ख़िज़ा बन जाएगी,
ग़ुलज़ार मेरी ज़िन्दगी बेकार हो जाएगी,
वाह रे ख़ुदाई। तेरा विधान,
मुझे दिलादो इससे निदान,
ओ ख़ुदा तूने एसा क्यों किया।।।

3 comments:

ritu raj said...

gud one. kuch lines to bade touching hai.
keep writing.

Rakhee said...

Ae Hemant ye tune kya kiya :)
itna mast tune kaise likh diya...
ye sirf pyaar me hone ki kalpna thi,
ya vakai me tune dil kisi ke naam likh diya ;)
.
.
. keep up d gud work....

Ishika said...

sach mein bahut hi accha likha hai.