
पुरानी यादें खर्च करना चाहता हूं
मैं फिर से सबसे मिलना चाहता हूं
याद आता है वो दौर---
वो तस्वीर खिंचवाने की ललक
वो बात-बात पर लड़ने की सनक
वो धुंधली मैडल की चमक
वो चलना पगडंडी पर छोड़ के सड़क
वो Meeting Point का मज़ा
वो Bike से गिरने की सज़ा
वो पापा का समझाना
और मेरा हर बात पर सिर झुकाना
वो करना घंटों तक बक-बक
और चलना इतना कि जाना थक
पुरानी यादें खर्च करना चाहता हूं
मैं कुछ कहना चाहता हूं।।।
रहना हमेशा जोश से लबरेज़
करना कारनामे हैरतअंगेज़
वो देखना टीवी पर फैशन बार-बार
वो समझना खुद को बड़ा सुपरस्टार
वो सुनना गाना इतना तेज़
कि हिल जाए मेरे पड़ोसी की मेज़
वो Plan बनाना लड़की को प्रपोज़ का
लेकिन फिर कहना ये क़िस्सा है रोज़ का
वो बताना नौकरी का Burden
और कहना मैं तो हूं परेशान हरदम
वो करना सुबह शाम पार्टी
वो मानना खुद को Smarty
पुरानी यादें खर्च करना चाहता हूं
मैं कुछ कहना चाहता हूं।।।
3 comments:
वो सुनना गाना इतना तेज़
कि हिल जाए मेरे पड़ोसी की मेज़
ये लाइनें तो बेहद ही उम्दा हैं...हेमंत भाई...कमाल कर दिए हो...लगे रहो
हेमंत, इधर काफी दिनों से कुछ ज्यादा ही व्यस्त हूं। तुम्हारे क्या, अपने ब्लॉग को भी समय नहीं दे पा रहा हूं। हम दो अलग-अलग जिंदगियों के रास्तों पर एक साथ दौड़ते हैं। एक तरफ हमारी अपनी अभिव्यक्ति होती है और एक तरफ दुनियावी जरूरतें। हकीक़ी ज़िंदगी की जरूरत पूरी करने के लिए घड़ी की सुईयों के साथ दौड़ते-दौड़ते हांफनी चढ़ जाती है। खैर तुम्हारा मेल देखते ही मैं यहां आया हूं। तुमने बहुत अच्छे ढंग से अपने दिल की बात कह दी। तुममें बहुत स्पार्क है। क्योंकि तुम कोशिश करते हो। तुम्हारे अंदर शहर और गांव का सामंजस्य है। बहुत बढ़िया रचना है। एक कविता और याद आई। स्मृति वैसे तो एक रंगहीन, गंधहीन मुरझाया सा गुलाब, खटकती है खटकती रहेगी सदा कांटों की तरह इसकी मीठी चुभन। स्मृति एक टूटा-फूटा ऐसा खिलौना, जिसे ना फेंका ही जा सकता है और न जो दिल ही बहला सकता है। तो यादें खर्च करने से भी दिमाग के खीसे या कह लो कि रीफ्रिजरेटर में पड़ी रहेंगी। अंदर से ताज़ा और ऊपर से बोसीदा। जब छेड़ोगे, या तो महकने लगेंगी या फिर गंधा उठेंगी।
sach mein dear is ko padh kar college time ki yaad aati hai accha likha hai apne.
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