13.5.10

नकेल कसनी है मुझे।।।



नकेल कसनी है मुझे
आज के व्हशी समाज की
स्कूलों में बढ़ती फीस के मिजाज़ की
सरकारी दफ्तरों के कामकाज की
पंचायतों के बेमानी अंदाज़ की

नकेल कसनी है मुझे
फालतू के बाज़ारवाद की
गिरते मौलिक अधिकार की
तार-तार होते रिश्तों के धार की
आस्था से खिलवाड़ की
गिरते सुर और साज़ की

नकेल कसनी है मुझे
आतंकवाद की आग की
खेल से खिलवाड़ की
काले कारोबार की
गुंडों के विस्तार की
पैसों की गुहार की
और पनपते भ्रष्टाचार की

नकेल कसनी है मुझे
पुलिस के व्यापार की
गुस्से और तक़रार की
लड़कियों के व्यापार की
बचपन पर पड़ते भार की
और नेताओं के दुलार की।।।

4 comments:

Unknown said...

बढ़िया लिखा है दोस्त अच्छा लगा पढ़कर, दिल में जज्बात हैं, उमंग है, लहर है, तरंग है, उजली सी यादे हैं, बनाए रखना इन्हें, अंधेरे में जाना लेकिन उस अंधेरे को उजाले पर हावी न होने देना ।

zindagi ki kalam se! said...

gud...achha likha hai!

Madhukar said...

आइडिया तो अच्छा है लेकिन सतही सिस्टम को समझकर उसपर उतरना होगा और एक रोडमैप तैयार करना होगा। है कोई प्लान इसके लिए?

Anonymous said...

Rashid Khan-Wow...! Gehri Soch,tumari dil me aag kaafi hai....