18.10.10

भूख...

भूख...



कोई रोता है कोई बिलखता है,
ऐसा सिर्फ हिन्दोस्तान में ही क्यों होता है,
शिक्षा और भोजन बेहतर इंसान का आधार है,
लेकिन ये बातें हमारे यहां निराधार हैं,
यमराज के चमचे कइयों को लीलने को तैयार हैं,
भूख से यहां फैला हर ओर हाहाकार है,
सरकार के घर सब मोटापे के शिकार हैं,
भूख से सिर्फ ग़रीब ही क्य़ों बेकार है,
अनाज के सड़ने का सबको बेसब्री से इंतज़ार है,
नालों के बड़े रास्ते कबके तैयार हैं,
अनाज का इतना होना भी एक चमत्कार है,
खुले में उसे डालकर किया सबने बलात्कार है,
कोर्ट की दखलअंदाज़ी इनको बेकार लगती है,
शरद पवार को ये उनकी हार लगती है,
ना दुआओं का अहसास... ना बद्धुआओं का डर,
सरकारी गैंडों को नहीं होता कोई असर,
भूख का किया ये कैसा व्यापार है,
गरीब को छोड़ा भूखा---
और अमीर को बेकारी का अधिकार है,
लड़ाई है कैसी यहां ना खंजर ना तलवार है,
इनके पास सिर्फ रोना, बिलखना, चीख और पुकार है,
मरने वालों की संख्या यूं हीं नहीं बढ़ती हर बार है,
इससे तो सरकार के सपने होते साकार हैं,
कब मिटेगी ये भूख--- कब होगा अहसास हमें,
कैसी है भूख ? कैसा इसका व्यापार है ?


1 comment:

sandhyagupta said...

ek bada sawal puchti hai aapki yah rachna.par jawab dene wala koi nahin.