8.2.10



बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने

है बाक़ी कुछ स्याही और चंद पन्ने,
मन में है मेरे भी कुछ सपने,
ना जाने कितने लिख पाउंगा क़िस्से,
जो कभी बन पाए मेरे जीवन के हिस्से,
इंतज़ार है मुझे किसी का,
पता दे...वो मुझे उसी का,
बेक़रार हूं तो मैं उस सुबह का.. .
जो रात को धकेल कर आए,
और मेरे संग हो जाए,
फिर कुछ याद मुझे भी आए,
तब सारे दिन वो मुझसे बतियाए,
कभी मुस्काए...तो कभी चंहचहाए ।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने

शायद भूला हूं मैं कुछ...
क्योंकि ये तो है बदनाम शहर,
जहां हर वक्त होता है एक पहर,
यहां सुबह... सुबह जैसी नहीं होती,
क्यों अब हर पल लगता है, कि कुदरत रोती,
ना ओस है, ना धुंध
पक्षियों का चंहचहाना भी है गुम़,
जो कभी गाया करते थे,रुमझुम
पर अब तो मिलती है दूधिया लाइट,
जो रहती है, हर दम ब्राइट।
सूरज तो था...कभी आग का गोला,
लेकिन शहरों में तो वो दिखता है भोला,
अब तो सूरज भी चौंक कर बोला...
कि मैंने ऐसा क्या बोला ?
मैंने तो सिर्फ सच्चाई पर से पर्दा खोला ।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने


शहर नहीं है ये...ये है कहर,
जिससे कुदरत भी बेकार हो गई।
ये कैसी शाम है ? जो थोड़ी बदनाम है…
रात तो लगती अफसाना है,
उसे भी ठगने का शायद ये कोई नया बहाना है,
कैसा है ये कुछ स्याही और चंद पन्ने का सफर,
स्याही ने जब तोड़ा दम,
तो पन्ने को भी हुआ ग़म,
ख़त्म हुआ आज का ये किस्सा,
जिसका मैं था हिस्सा।
बाक़ी है स्याही और चंद पन्ने ।।।

4 comments:

kshama said...

है बाक़ी कुछ स्याही और चंद पन्ने,
मन में है मेरे भी कुछ सपने,
ना जाने कितने लिख पाउंगा क़िस्से,
जो कभी बन पाए मेरे जीवन के हिस्से,
Bahut sundar!

Anonymous said...

Hey Mr.Saini its realy beautiful.
Keep It Up Dude

संगीता पुरी said...

अच्‍छी लगी आपकी रचना .. इस नए चिट्ठे के साथ हिन्‍दी चिट्ठा जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

yun hi ek khayal mein said...

nice